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यूरोप नहीं खरीदेगा नई हर्बल दवाएं

यूरोप में एक मई से आयुर्वेदिक और हर्बल दवाओं की बिक्री के नियम बेहद सख्त कर दिए गए हैं। नए नियमों के तहत वही हर्बल दवाएं वहां बिक सकेंगी जो 15 साल से या तो यूरोप में या 30 साल से किसी अन्य देश में बिक रही हैं। नई दवाओं के लिए यूरोप के दरवाजे बंद होने से भारत के 1,000 करोड़ रुपये के हर्बल दवा निर्यात के प्रभावित होने की आशंका है।

दवा उद्यमी चिंतित हैं लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय का तर्क है कि आयुर्वेदिक दवाएं यूरोप में दवा के रूप में भले ही नहीं बिकें, खाद्य वस्तु के रूप में वे पहले की तरह बिकती रहेंगी। इसलिए नए नियमों से उद्यमी डरें नहीं। यूरोपीय देशों भारत से यूनानी और आयुर्वेद के करीब 2,000 उत्पाद निर्यात होते हैं। हर्बल मेडिसिन के रूप में पश्चिमी देशों में ये बहुत लोकप्रिय हैं, पर यूरोप में इन्हें स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जा रहा। इसलिए यूरोपीय संघ ने एक मई से एक कानून लागू कर इनकी बिक्री सीमित कर दी है। एमिल फार्मास्युटिकल के प्रबंध निदेशक के.के. शर्मा के मुताबिक, ईयू के नए प्रावधान आयुर्वेदिक दवाओं के लिए बेहद कठिन हैं। हिमालय कंपनी से जुड़े डा. फारुक कहते हैं, आयुर्वेदिक दवाएं खाद्य सामग्री के रूप में बिकने पर भले कंपनियों को नुकसान न हो, हमारी पैथी को नुकसान होगा। ज्यादा समय तक वह दवा बाजार में साख कायम नहीं रख पाएगी।

 

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