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वह तो जीनियस है

उस लड़के को देखकर वह परेशान क्यों हो जाते हैं? यह लड़का अपना काम वक्त पर कर ही लेता है। परेशानी शायद उम्मीदों की है। पहली नजर में वह जीनियस लगा था। लेकिन..।
आमतौर पर हम जीनियस को टैलेंट के आईने में देखते हैं। लेकिन ‘जीनियस के लिए टैलेंट तो चाहिए ही। उसके साथ जरूरी है नएपन के लिए खुलापन। और जबर्दस्त फोकस।’ यह मानना है डॉ. त्रिशा गुरा का। वह ब्रैंडिस यूनिवर्सिटी में रेजीडेंट स्कॉलर हैं। लेकिन खुद को साइंस-मेडिकल जर्नलिस्ट कहलाना पसंद करती हैं। उनकी एक किताब काफी चर्चित हुई है, ‘लाइंग इन वेट।’

सिर्फ टैलेंट से कोई जीनियस नहीं हो सकता। यह ठीक है कि जीनियस के लिए बेहतर जीन जरूरी हैं। वह जीन पहले-पहल टैलेंट के तौर पर दिखलाई पड़ते हैं। लेकिन  टैलेंट से जीनियस तक का सफर आसान नहीं होता। असल में टैलेंट से तो जीनियस का सफर शुरू होता है। टैलेंट को खूब मांजना पड़ता है। टैलेंट में बड़ा काम करने की संभावना होती है। लेकिन वह जीनियस तब होता है, जब बड़ा काम कर डालता है।

स्कूल के दिनों में सचिन तेंडुलकर और विनोद कांबली जबर्दस्त टैलेंट के तौर पर सामने आए थे। लेकिन सचिन जीनियस हो गए और विनोद महज टैलेंटिड से आगे नहीं बढ़ पाए। दोनों में टैलेंट था। शायद कांबली में कुछ ज्यादा ही था। लेकिन टैलेंट से जीनियस तक का सफर करना सचिन जानते थे। उन्होंने अपने टैलेंट को खूब निखारा। जमकर मेहनत की। अपने को फोकस में रखा। कहीं कोई भटकाव नहीं। एक खुलापन हमेशा से उनमें था। इसीलिए हर छोटे-बड़े से उन्होंने सीखा। उन पर सवाल कम नहीं खड़े किए गए। लेकिन वह हर सवाल से जूङो और बेहतर जवाब के साथ आगे आए। टैलेंट के आगे कुछ करना होता है। इसे कांबली कभी नहीं समझ पाए। फर्क हमारे सामने है।

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