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घिर चुका है पाकिस्तान

ओसामा बिन लादेन की मौत की खबर ने काबुल में अन्य किसी भी चीज के मुकाबले सवाल कहीं अधिक पैदा किए हैं। सवाल इस बाबत कि अल कायदा प्रमुख के खात्मे का मौजूदा जंग के संदर्भ में क्या मतलब है और क्या तालिबान की लड़ाई का नया दौर शुरू होगा। लेकिन इन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लादेन के अंत के बाद ‘दहशतगर्दी के खिलाफ जंग’ में पाकिस्तानी रवैये को लेकर उपजे सवाल सबसे ज्यादा तल्खी लिए हुए हैं। अफगान राष्ट्रपति ने कहा है कि ‘अमेरिकियों ने लादेन को लोगार में नहीं पाया, और न ही वह उन्हें कंधार में मिला या काबुल में.. उन्हें वह पाकिस्तान के एबटाबाद में मिला।’ करजई ने हालांकि अपने वक्तव्य में नाटो की कुर्बानी और अमेरिका की सराहना की, पर वह अपनी हताशा छिपा नहीं पाए। उन्होंने कहा, ‘पिछले दस वर्षों से हम जो कह रहे थे, नाटो व दुनिया ने उसे कभी नहीं सुना। हम झुलसते रहे और अब ओसामा एबटाबाद में मारा गया है।’ कुछ विश्लेषकों का मानना है कि जिस तरह से लादेन को मारा गया है, उससे एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान पाकिस्तान पर केंद्रित हो गया है। एक विश्लेषक ने तो यहां तक कहा कि यही मौका है, जब पाकिस्तान के ‘सरकार समर्थित आतंकवाद’ से निर्णायक तरीके से निपटा जाए। अलजजीरा के साथ एक बातचीत में अफगानिस्तान के विदेश मंत्री के सलाहकार डॉ. दाऊद मोरादियां ने कहा, ‘आईएसआई को एक आतंकी संगठन घोषित किया जाना चाहिए।’ मोराबियां की दलील है कि हमने दहशतगर्दी के सबसे बड़े प्रतीक को भले ही खत्म कर दिया हो, लेकिन पाकिस्तान में इससे जुड़े तीन तत्व अब भी कायम हैं- आतंक की विचारधारा, बुनियादी सुविधाएं और मुफीद माहौल। और जब तक विश्व बिरादरी अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों के साथ आईएसआई के रिश्तों का हल नहीं ढूंढ़ लेती, तब तक आशंकाएं बनी रहेंगी। कई लोगों का मानना है कि लादेन की मौत से नाटो फौजों का मनोबल बढ़ा है, लेकिन देश में चल रही जंग पर इसका बहुत असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि हाल के वर्षो में बिन लादेन का पूरा ध्यान अपनी गिरफ्तारी से बचने पर था, इसलिए उसने अपना ज्यादातर काम सहायकों को सौंप दिया था।
मुजीब मशाल, अलजजीरा

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