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दस की बजाय पंद्रह सालों के वर्किग प्लान की मांगी मंजूरी

सूखे, प्राकृतिक वजहों से गिरे और स्वीकृत परियोजनाओं के दायरे में आने वाले पेड़ों के अलावा बाकी पेड़ों को काटने की मंजूरी मिलना मुश्किल होगा।  हरियाली को बचाने और इसमें इजाफा करने के लिए वन विभाग ने नई पहल की है वन एवं पर्यावरण मंत्रलय को भेजे जा रहे वर्किग प्लान रिपोर्ट में इसके लिए कड़े प्रावधान हैं। साथ ही दस की बजाय पंद्रह सालों के लिए कार्ययोजना तैयार की गई है। साल 1999 के साढ़े तीन लाख पेड़ों की तुलना में अब डेढ़ लाख पेड़ ही शेष रह गए हैं। वहीं 1987 से अब तक 245 हेक्टेयर फॉरेस्ट एरिया डायवर्ट हो चुका है। 

बढ़ते प्रदूषण और घटते वन क्षेत्र ने विभाग की चिंताएं बढ़ा दी हैं। जिला में 9268 हेक्टेयर ग्रीन कवर एरिया है। इसमें 1443 संरक्षित वन क्षेत्र है। भले ही सरकारी रिकाडरे में वन क्षेत्र धीमी गति से घट रहा हो लेकिन वन क्षेत्रों में गैर वानिकी उद्देश्यों को लेकर गतिविधियां बढ़ी हैं जिससे पर्यावरण को भारी क्षति होने का सच सामने नहीं आ पा रहा है। यानि नुकसान अनुमान से कहीं गुना है। पहले प्राथमिक कार्ययोजना रिपोर्ट (प्रिलिमिनरी वर्किग प्लान) और दूसरे पीडब्ल्यूपीआर को मंजूरी मिलने के बाद अब स्टैंडर्ड वर्किग प्लान रिपोर्ट भी बनकर तैयार हो गई है। जल्द ही इसे मंजूरी के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रलय भेजा जाएगा। इससे पहले दस सालों के लिए वन संरक्षक रिपोर्ट तैयार करता था। विकास के नाम पर पेड़ों की बलि ने चिंताजनक हालात पैदा कर दिए हैं इसलिए अब पंद्रह सालों के लिए मंजूरी मांगी गई है ताकि फॉरेस्ट एरिया और ग्रीन कवर में बढ़ोतरी के लिए नए सिरे से रणनीति बनाई जाए और इसमें फेरबदल की गुंजाइश कम हो। एडिशनल डीएफओ बीएस राणा ने बताया कि पंद्रह सालों के लिए वर्किग प्लान को केंद्र की मंजूरी मिलने के बाद जल्द इसमें बदलाव की संभावना खत्म होगी जिससे हरियाली को बढ़ाने के लिए किए बेहतर उपाय जारी रहेंगे।  भारतीय वन सेवा अधिकारी एम डी सिन्हा कहते हैं कि पिछले एक दशक में औद्योगिक विकास, सड़क चौड़ीकरण, कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम पर लाखों पेड़ों की बलि दी जा चुकी है। कई बार आवश्यक कार्यो के लिए ऐसा न कर पाने की कोई सूरत नहीं रहती। पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ती गर्मी और ग्लोबल वार्मिग के दुष्प्रभावों को शहरों में महसूस किया जा रहा है अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए तो साइबर सिटी में कंक्रीट के जंगल ही शेष रह जाएंगे।  

उजड़ती साइबर सिटी - गुड़गांव में आरटीआर जंक्शन और दिल्ली-जयपुर हाईवे के लिए ही 70 हजार पेड़ों की बलि दी जा चुकी है इसके अलावा एक्सप्रेस वे के लिए भी पांच हजार पेड़ काटे गए। हरे-भरे पेड़ों को काटने की एवज में प्लांटेशन का प्रावधान है। जिसके अनुसार एक हेक्टेयर तक के क्षेत्र में काटे गए पेड़ों के दोगुने और एक से ज्यादा हेक्टेयर क्षेत्र में काटे गए पेड़ों की संख्या के बराबर पेड़ और जमीन  वन विभाग को देने का प्रावधान है। बराबर की जमीन देने के  नियम से पीडब्ल्यूडी और एनएचएआई को बाहर रखा गया है इनसे वन विभाग प्लांटेशन की राशि ही लेता है। असल समस्या यह है कि गुड़गांव में प्लांटेशन के लिए पर्याप्त जमीन नही है इसलिए कंपनियां काटे गए पेड़ों की एवज में महेंद्रगढ़, पटौदी, नजफगढ़ में जमीन लेकर प्लांटेशन करती हैं। जिससे गुड़गांव शहर की फिजा को कोई फायदा नहीं होता।

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  • Web Title:पंद्रह सालों के वर्किग प्लान की मांगी मंजूरी