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आयुर्वेद पर पाबंदी

यूरोपीय संघ (ईयू) के देशों में एक मई से परंपरागत और हर्बल दवाओं के बारे में नए और सख्त नियम लागू हो गए हैं और इनसे भारतीय आयुर्वेदिक दवाओं की बिक्री पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। इन नियमों के मुताबिक, वहां वही दवाएं बेची जा सकती हैं, जो अपने देश में कम से कम 30 वर्ष और यूरोपीय संघ में 15 वर्ष तक प्रचलित हों और उनके किसी दुष्प्रभाव की शिकायत नहीं होनी चाहिए। या फिर उन दवाओं को उन्हीं प्रयोगों से गुजरकर उन्हीं मानकों पर खरा उतरना होगा, जो आधुनिक चिकित्सा की दवाओं के लिए मान्य है। जाहिर है, ज्यादातर आयुर्वेदिक दवाओं के लिए इन दोनों में से किसी भी शर्त पर उतरना कठिन होगा और उन्हें यूरोप में बेचना तकरीबन असंभव हो जाएगा। इस फैसले की घोषणा फरवरी में हुई थी और भारत सरकार व भारतीय दवा उद्योग ने काफी कोशिश की कि फैसले में कुछ ढील मिले, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। आयुर्वेद के पैरोकार यह भी कह रहे हैं कि यह फैसला बहुत कठोर है और यह यूरोपीय दवा उद्योग के दबाव में किया गया है। वे यह भी कहते हैं कि इससे उन आम लोगों को नुकसान होगा, जिन्हें कई पुरानी बीमारियों में आयुर्वेदिक दवाओं से फायदा हुआ है। परंपरागत दवाओं की लोकप्रियता यूरोप और अमेरिका में बढ़ रही है। सर्वेक्षण बताते हैं कि यूरोप में एक चौथाई से ज्यादा लोग परंपरागत दवाएं इस्तेमाल करते हैं। परंपरागत और हर्बल दवाओं में आयुर्वेद के अलावा चीनी, अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी जड़ी-बूटियों से बनी दवाएं भी लोकप्रिय हैं और इन पर पाबंदी से इन दवाओं को बनाने और बेचने वालों की नाराजगी समझ में आती है।

लेकिन मामले का दूसरा पक्ष भी है। परंपरागत दवाएं बेचना तो ठीक है, लेकिन अक्सर इन दवाओं के विटामिन और दूसरी चीजों के साथ मिश्रण बड़े-बड़े दावों के साथ बेचे जाते हैं। ऐसा यूरोप में ही नहीं, हमारे यहां भी होता है, लेकिन हमारे यहां नियम उतने सख्त नहीं हैं। यह भी प्रचारित किया जाता है कि इन दवाओं के कोई दुष्प्रभाव नहीं हैं, जबकि कई दवाओं के दुष्प्रभाव देखे गए हैं। यह भी हुआ है कि किसी दवा के दावों पर खरे उतरने के कोई प्रमाण नहीं होते और मरीज की स्थिति उन्हें लेते रहने से और खराब हो जाती है। कई आयुर्वेदिक और हर्बल दवाओं के दुष्प्रभाव को लेकर विदेशों में कई शोध हुए हैं और उनसे यह साबित होता है कि ये दवाएं उतनी सुरक्षित नहीं हैं, जितना दावा किया जाता है। आयुर्वेद के जानकार भी यह मानते हैं कि इन दवाओं को किसी योग्य चिकित्सक की सलाह से और देखरेख में ही लेना चाहिए, लेकिन इन्हें बनाने वाली कंपनियां मरीजों को यह नहीं बतातीं। जरूरी यह है कि परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों वाले देश मिलकर कोई नियामक संस्था बनाएं, जो इन दवाओं की गुणवत्ता की देखरेख कर सके और यह संस्थान ईयू जैसे संगठनों को देसी और परंपरागत दवाओं के बारे में समझाए। यह भी हो सकता है कि ईयू में डॉक्टरों को भी इन दवाओं के बारे में कुछ जानकारी दी जाए, ताकि वे मरीजों के हित में आधुनिक दवाओं के साथ इनको भी इस्तेमाल करें। हमें ईयू का फैसला हमारी परंपरागत चिकित्सा प्रणालियों के साथ अन्याय लग सकता है, लेकिन ईयू को भी अपने नागरिकों के हित में नियम बनाने का हक है। बेहतर यह होगा कि भारतीय परंपरागत दवा उद्योग अपने लिए कुछ मानक तय करे, वैज्ञानिक तरीकों से दवाओं का परीक्षण करे और आयुर्वेद को ज्यादा सुरक्षित चिकित्सा प्रणाली बनाए। अगर ऐसा हुआ, तो पूरी दुनिया में इसकी बढ़ती लोकप्रियता को कोई रोक नहीं पाएगा।

 

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  • Web Title:आयुर्वेद पर पाबंदी