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आखिर वो अमेरिका है

लादेन को मारने में अमेरिका को भले ही दस साल लगे हों, लेकिन पहले सद्दाम हुसैन और अब लादेन को मार कर अमेरिका ने यह साबित कर दिया है कि जिस किसी ने भी अमेरिका की ओर आंखें टेढ़ी की उसका बुरा हश्र हुआ। अमेरिका की यही खासियत उसे सुपर पावर बनाती है। इसके ठीक उलट भारत में अपराधी बेखौफ वारदात करके चले जाते हैं और हम उन्हें पकड़ नहीं पाते, अपितु दूसरे देश के आगे उन्हें पकड़ कर सौंपने के लिए गिड़गिड़ाते रहते हैं। और यदि जाबांज सैनिकों ने किसी आतंकी को पकड़ भी लिया तो हम उसे सुसज्जित जेल रूपी गेस्ट हाउस में मेहमान बनाकर रखते हुए देश की जीडीपी का एक हिस्सा उसकी सुरक्षा व मेहमाननवाजी पर खर्च कर डालते हैं। और उसके बाद अदालती कार्रवाई के नाम पर उसे बिंदास ढंग से जीने का पूरा मौका देते हैं। सत्र, जिला, हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा चलते हुए ऐशोआराम से उसकी जिन्दगी कट जाती है।
दिनेश तिवारी, खटीमा

नारी सशक्तीकरण का सच
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि देश में इस समय महिला सशक्तिकरण का दौर चल रहा है। देश की राष्ट्रपति से लेकर नेता प्रतिपक्ष तक के पदों को संभालने वाली महिलाएं ही हैं। उत्तराखण्ड और बिहार जैसे राज्यों ने महिलाओं को पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण देकर सशक्त करने का जो प्रयास किया है, वह निश्चित रूप से सराहनीय है। लेकिन अफसोसजनक बात यह है कि कहीं न कहीं सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में बैठी कुछ महिलाएं अपने दायित्वों का पूरी जिम्मेदारी के साथ निर्वहन नहीं कर पा रही है। परिणाम स्वरूप इस पुरुष प्रधान समाज में नारी आज भी अपने अधिकारों के लिए लड़ने में सबल नहीं है। हाल ही में मुंबई की एक महिला ने अपने 6 साल के बेटे के साथ सातवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली, क्योंकि ससुराल वाले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित कर उस पर चरित्रहीन होने के आरोप लगाते थे।
पारुल गंगवार, चंद्रकुटी, टनकपुर

दावाग्नि का कहर
ग्रीष्म ऋतु के शुरू होते ही दावाग्नि अपना कहर बरपाने लगी है। प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों की वन सम्पदा दावाग्नि की भेंट चढ़ जाती है। इन धधकते जंगलों को बचाने के लिए वन विभाग तथा शासन द्वारा बिल्कुल भी प्रयास नहीं किए जाते हैं। जहां एक ओर वन प्रशासन अग्निशमन यंत्रों तथा वनकर्मियों की कमी बताता है, वहीं दूसरी और शासन वित्त का रोना रोता है। दावाग्नि के कहर में आम जन की भी भागीदारी होती है, लेकिन उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं होती है। जिसके कारण उनके हौंसले बुलंद हैं, जो भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।
मनोज कुमार खोलिया, बागेश्वर

विकास या विनाश
अकेले उत्तराखण्ड में पर्यटन की इतनी संभावनाएं मौजूद हैं, जितनी किसी और राज्य में देखने को नहीं मिलती। मगर उत्तराखण्ड को स्विटजरलैण्ड बनाने की रट लगाए राज्य के हुक्मरानों ने विगत एक दशक में पर्यटन विकास के नाम पर राज्य की जो दशा कर दी है वह काफी विचारनीय है। सबसे पहले तो राज्य की पावन नदियों को बड़े-बड़े बांधों के हवाले कर दिया गया, बची-खुची कसर पर्यटन व विकास के नाम पर भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी।
शंकर प्रसाद तिवारी, गुप्तकाशी

मौत पर खामोशी क्यों
लादेन के मारे जाने पर अमेरिका में जश्न का महौल है। अवश्य ही न्यूयार्क में जेहादी हमले में मारे गए चार हजार बेकसूर लोगों की आत्मा को शांति ही नहीं मिली है, बल्कि अपने अमेरिकी होने पर पुन: अमेरिका के लोग गर्व का अनुभव कर रहे हैं। यह सभ्य दुनिया की विजय है पर भारत में विशेष खुशी का इजहार नहीं किया गया। मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, जो हर घटना पर अपनी टिप्पणी देने के लिए कूद पड़ते थे, एकदम शांत हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
रमेश चन्द्र आनन्द, देहरादून

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