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एबटाबाद की अनसुलझी गुत्थियां

अभी तक जो खबरें मिली हैं, वे यही बताती हैं कि ओसामा बिन लादेन को मारने के अभियान को पूरी तरह से अमेरिका ने ही अंजाम दिया था। लेकिन अमेरिकी स्पेशल फोर्स को पाकिस्तान के अंदर सक्रिय होना था और हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया जाना था, इसलिए बहुत मुमकिन है कि अफगानिस्तान से हेलीकॉप्टरों के उड़ान भरने से पहले इसकी सूचना पाकिस्तानी फौज के जनरल अश्फाक परवेज कियानी को जरूर दी गई होगी। हालांकि अमेरिकी अधिकारी यही कह रहे हैं कि पाकिस्तान को खबर उड़ान भरने के बाद ही दी गई थी। वर्ष 1998 में जब बिल क्लिंटन ने जलालाबाद में अल कायदा के शिविर पर क्रूज मिसाइल से हमला किया था, तब यही प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसके पीछे कारण यह था कि पाकिस्तान कहीं इसमें बाधा न डाल दे। वह कहीं यह न समझ ले कि यह हमला भारत से हुआ है और जवाबी हमला न कर दे। इसलिए उम्मीद है कि ऐसी सावधानी इस बार भी बरती गई होगी। और फिर एबटाबाद एक फौजी अहमियत वाला शहर है, इसलिए वहां का हवाई सुरक्षा कवर भी मजबूत होगा।

ऐसे में, पाकिस्तानी फौजों को अमेरिकी हेलीकॉप्टरों पर हमला बोलने से रोकना भी जरूरी रहा होगा। यह ऑपरेशन इतनी देर तक चला और पाकिस्तानी फौज ने उस पर हमला नहीं किया, इसका मतलब है कि उसे इसकी जानकारी दे दी गई थी। वैसे अमेरिका पाकिस्तान में इस तरह के ऑपरेशन पहले भी कर चुका है। वर्ष 2002 में फैसलाबाद और कराची में अबू जुबैदा और रमजी बिनाल्शिभ को पकड़ने के लिए लगभग यही किया गया था। इसके एक साल बाद 2003 में रावलपिंडी में खालिद शेख मुहम्मद को पकड़ने के लिए अमेरिका ने ऑपरेशन किया था।

लेकिन ये सारे ऑपरेशन अमेरिका और पाकिस्तान के साझा अभियान थे, जिनमें आईएसआई ने एक प्रमुख भूमिका निभाई थी। लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है कि इस बार आईएसआई ने कोई भूमिका निभाई या नहीं। वे तमाम ऑपरेशन अमेरिका के टेक्निकल इंटेलिजेंस के परिणाम थे। जिसका सुराग तीन गिरफ्तार किए गए लोगों के मोबाइल फोन से मिला था। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि ओसामा बिन लादेन के खिलाफ हुए मौजूदा ऑपरेशन की जानकारी अमेरिका ने पाकिस्तान को दी थी। वह किसी संचार उपकरण का इस्तेमाल नहीं कर रहा था, इसलिए टेक्निकल इंटेलिजेंस भी मुमकिन नहीं था। यह पूरी तरह ह्यूमन इंटेलिजेंस का नतीजा ही हो सकता है।

यह शायद इसलिए भी मुमकिन हो पाया होगा कि एबटाबाद हाजरा लोगों का शहर है। हाजरा लोग अल कायदा और अफगानिस्तानी तालिबान के पूरी तरह खिलाफ हैं। काबुल में जब तालिबान की सरकार थी, तो उन्होंने बहुत से हाजरा लोगों की हत्या कर दी थी। इनमें से बहुत से लोग शिया थे। इसलिए हैरत की बात यही है कि लादेन ने ऐसी जगह शरण लेने के बारे में क्यों सोचा। हैरत की बात यह भी है कि एक रिटायर फौजी जनरल द्वारा बनवाई गई इतनी बड़ी हवेली में वह अपने पूरे परिवार के साथ रह रहा था और किसी को शक भी नहीं हुआ।
अमेरिकी मीडिया बता रहा है कि इस हवेली पर पिछले साल अगस्त से नजर रखी जा रही थी। 29 अप्रैल को जब इसमें लादेन की मौजूदगी की पक्की खबर मिल गई, तो ओबामा ने ऑपरेशन को मंजूरी दी। ऐसा ही बैतुल्ला महसूद के मामले में हुआ था। फर्क इतना भर था कि लादेन के मामले में मिसाइल का इस्तेमाल नहीं किया गया। वहां स्पेशल फोर्स की टीम को गोलीबारी के लिए भेजा गया।

आखिर ओसामा बिन लादेन ने एबटाबाद को अपनी रिहाइश के लिए क्यों चुना, जबकि वहां बड़ी संख्या में हाजरा लोग रहते हैं? इसकी एक ही वजह लगती है। लगता है, ओसामा को यह आत्मविश्वास था कि एबटाबाद में उसकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम रहेंगे। और यह आत्मविश्वास बिना स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस की मदद के संभव नहीं था। साथ ही गैर हाजरा लोगों का भी उसे समर्थन रहा होगा। परिस्थितिजन्य साक्ष्य तो यही जाहिर करते हैं। हालांकि जो लोग पकड़े गए हैं, उनसे अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों की पूछताछ के बाद सचमुच इस सवाल का जवाब मिल पाएगा।

लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अब अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों का क्या होगा? क्या पाकिस्तान के प्रति अब भी अमेरिका का वैसा ही रुख रहेगा, जैसा पहले रहा करता था? अल कायदा के खिलाफ अपनी ढीली-ढाली कार्रवाई के कारण पाकिस्तान अमेरिका का विश्वास पहले ही खोने लगा था। अमेरिका को यह लगने लगा था कि पाकिस्तान दोमुंही चाल चल रहा है। यह शंका अब और गहरी हो जाएगी। अमेरिकी अधिकारी आखिरकार यह कहने लगे ही हैं कि लादेन एबटाबाद जैसी पॉश लोकैलिटी में बिना पाक सुरक्षा एजेंसियों की जानकारी के नहीं रह सकता था। जब तक अमेरिका को इसके पुख्ता प्रमाण नहीं मिल जाते, तब तक तो वह पाकिस्तानी हुकूमत के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगा। इसलिए लगता है कि फिलहाल अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते पूर्ववत ही रहेंगे। वे कभी ऊंचे और कभी नीचे हो सकते हैं। एक दूसरे की तारीफें भी हमें सुनने को मिल सकती हैं।

यहीं पर यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या बराक ओबामा अपनी अफगान-पाकिस्तान नीति में किसी तरह का बदलाव करेंगे? कहा जा रहा है कि अब अफगानिस्तान में अमेरिका अपनी फौजों को कम करना शुरू कर देगा। लेकिन मुझे लगता है कि अभी वह ऐसा नहीं करेगा। जब तक अफगानिस्तान में जमीनी स्तर पर हालात सुधर नहीं जाते, और अफगान सेना उसके लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हो जाती, तब तक अमेरिका अफगानिस्तान में जमा रहेगा, क्योंकि उस पर तालिबान का जबर्दस्त दबाव है। फिर पाकिस्तान में सक्रिय अल कायदा से जुड़े संगठन मसलन तहरीके तालिबान पाकिस्तान, लश्कर-ए-जंगवी और जैश-ए-मोहम्मद पाकिस्तानी हुकूमत पर यह दोषारोपण करेंगे कि उसने अमेरिका के साथ मिलकर बिन लादेन को मरवाया है। इसलिए पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों और अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ वे आत्मघाती हमले बढ़ा सकते हैं।

बहुत से जानकार यह कह रहे हैं कि ओसामा की मौत के बाद अल कायदा का भी अंत शुरू हो चुका है। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। यह सही है कि लगातार अमेरिकी ड्रोन हमलों के कारण अल कायदा बेहद कमजोर हो चुका है। उसका तंत्र काफी हद तक छिन्न-भिन्न हो चुका है। उसके नेता जगह-जगह पाकिस्तान में पनाह ले रहे हैं। वैसे भी कमजोर पड़ने की प्रक्रिया वर्ष 2002 से चल रही है। ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद वह और कमजोर हो सकता है। बावजूद इसके मुझे नहीं लगता कि अल कायदा अभी समाप्त हो जाएगा। जब तक उसे खाद-पानी मिलना एकदम बंद नहीं होता, तब तक उसका सफाया हो पाना मुश्किल है।

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