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यह हमारी उत्तर आधुनिक पीढ़ी है

हिंदी के युवा साहित्यकार अपनी पहचान के लिए व्याकुल हैं। कहानी, कविता और अब आलोचना के क्षेत्र में वे अपनी जगह का दावा कर रहे हैं। यह महत्वपूर्ण है। पिछले दिनों अज्ञेय संबंधी आयोजनों में से एक में युवा टिप्पणीकारों ने अज्ञेयादि कवियों की महानता पर सीधे संदेह व्यक्त किया। कई ने तो यह कह डाला कि इन कवियों को पढ़ा भी क्यों जाए। उम्रदराज साहित्यकारों ने ऐसी बातों का बुरा माना। उनकी आलोचना की। ऐसी कमेंटबाजी को गैर-जिम्मेदाराना कहा। कहा कि ऐसी टिप्पणियों से युवाओं का हिंदी साहित्य की समृद्ध पंरपरा और इतिहास के प्रति घोर उपेक्षा का भाव प्रकट होता है। लगता है कि वे अनपढ़ हैं, आदि इत्यादि।

जी नहीं, वे अनपढ़ नहीं हैं। खूब पढ़ी पढ़ाई है। उस्ताद हैं। बहुत चतुर चंट हैं। अगर यह युवा पीढ़ी अपने अतीत की किसी महानता से चिढ़ती है, तो उसकी प्रतिक्रिया में बड़ों की पीढ़ी भी युवाओं से चिढ़ती नजर आती है। यह पीढ़ीगत खाई मात्र नहीं है, बल्कि दो जमानों का इस कदर बदल जाना है कि एक जमाना दूसरे जमाने से अनजान-सा लगता है। आज की युवा पीढ़ी का संसार ग्लोबल है। उसमें एनजीओ भाव की स्वत:स्फूर्तता है। उसमें मोबाइली मोबिलिटी है। उनमें से अनेक की अपनी तगड़ी ब्लॉग-कल्चर है। उनमें से कई फेसबुक पर अपनी ग्लोबल समुदायी पहचान बनाते हैं। नित्य निज लीला गायन करते हैं। अपने समाज की बात भी करते हैं। वे स्वायत्त हैं, उनके स्वयंभू मंच हैं। किसी छोटे संपादक की छोटी पत्रिका   मोहताज नहीं। वे किसी प्रकाशक पर आश्रित नहीं। वे स्वयं प्रकाशित हैं।

यह ‘पोस्ट कोल्डवार’ के ‘पोस्ट मॉडर्न’ समय में पली-बढ़ी पीढ़ी है। उत्तर आधुनिकता हर तरह की ‘महानता’पर संदेह करती है। वह नई साहित्यिक प्रस्थापनाओं में दीक्षित है। ऐसा नहीं है कि वह हिंदी साहित्य के इतिहास को नहीं जानती, लेकिन वह उसके बोझ को भी लादकर नहीं चलती। युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से सिर्फ उम्र के लिहाज से अलग नहीं है। वह अपने अस्तित्व से लेकर अभिव्यक्ति तक अलग है। यह खूब पढ़ी-लिखी और ‘सूचनायुक्त’ पीढ़ी है। उसमें तरह-तरह के समूह सक्रिय हैं। उनके लिए साहित्य आत्माभिव्यक्ति से ज्यादा ‘सत्तामूलक विमर्श’ है। वह उनकी पहचान बनाने वाला नेटवर्क है।
पुरानी पीढ़ी साहित्य को अभिव्यक्ति का ‘छद्म’ धारण कराती रही है, जबकि मूलत: वह साहित्य के सत्तामूलक विमर्श में ही दत्त चित्त रही है। मर्म की यह बात नई पीढ़ी ने जरा जल्दी पहचान ली है और उस पर अमल भी आरंभ कर दिया है। वह उसकी एक्सपर्ट हो गई है। उसकी इस तेजी ने कई साहित्यिक गुरुघंटालों को बेरोजगार कर दिया है। वह किसी की चेली नहीं, बल्कि खुद ही गुरु और खुद ही चेला है। उसे कबीर का तीखापन पसंद है। वह रोने बिसूरने वाली नहीं। वह स्वयंभू है। 
सो सावधान! यह उत्तर आधुनिक पीढ़ी है।

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