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पाकिस्तान की दिशा

ओसामा बिन लादेन के मारे जाने से जितना बड़ा झटका अल कायदा को लगा है, उससे कहीं बड़ा पाकिस्तान को लगा है। पाकिस्तान की सरकार और सेना के लिए यह काफी असमंजस और शर्मिदगी का वक्त है। एक तो एबटाबाद में लादेन का मारा जाना यह साफ कर देता है कि लादेन पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की सुरक्षा में था। अमेरिकियों का यह कहना भी पाकिस्तानियों के लिए असहज स्थिति पैदा कर देता है कि यह पूरी मुहिम पाकिस्तानियों को बताए बगैर हुई थी। इसका एक अर्थ यह है कि आतंकवाद विरोधी लड़ाई में पाकिस्तान की भूमिका पर अमेरिकियों को भरोसा नहीं है। दूसरा अर्थ यह है कि पाकिस्तान इतना कमजोर देश है कि अमेरिकी सैनिक इस्लामाबाद के इतने करीब कार्रवाई कर सकते हैं। एक तरफ पूरी दुनिया यह मान रही है कि पाकिस्तान की आतंकवादियों से मिलीभगत है, दूसरी ओर आतंकवादी यह मानते हैं कि पाकिस्तान ने उनके साथ धोखा किया है और वे पाकिस्तान से बदला लेने की कसमें खा रहे हैं। यानी पाकिस्तान दो नावों की सवारी की जो चतुराई कर रहा था, अब उसका उसे खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। अमेरिका अफगानिस्तान से निकलने की कोशिश में उसे सहायता तो देता रहेगा, लेकिन अमेरिकी दखलंदाजी और बढ़ेगी और पाकिस्तान की संप्रभुता पर बार-बार चोट होती रहेगी। दूसरी ओर, पाकिस्तान की मदद से बढ़े-पले आतंकवादी पाकिस्तान पर लगातार हमले करते रहेंगे। इस मुश्किल से निकलने के लिए पाकिस्तानी सेना भारत विरोध को भड़का सकती है, और उससे फौरी फायदा भी हो सकता है, लेकिन ऐसी हर चतुराई के बाद पाकिस्तान और कमजोर होता जाता है। पाकिस्तान में राजनैतिक और प्रशासनिक तंत्र चरमरा गया है, अर्थव्यवस्था की स्थिति ऐसी है कि अगर अमेरिका पैसा न दे, तो कुछ महीने ही देश चल पाएगा। पाकिस्तान इसलिए बना हुआ है कि कोई नहीं चाहता कि एक परमाणु हथियार संपन्न देश अराजकता और आतंकवाद की गिरफ्त में चला जाए। जिस दिन अमेरिका के पास उसके परमाणु हथियारों से निपटने का तरीका आ जाएगा, उसके बाद संभव है कि पाकिस्तान लीबिया की हालत में पहुंच जाए।

इस चुनौती को पाकिस्तान चाहे तो संभावना में बदल सकता है। जरूरी है कि पाकिस्तान आतंकवाद के प्रति दोहरी नीति छोड़ दे, अब इसे और खींचना उसके लिए भी संभव नहीं रहा। अगर वह स्पष्ट आतंकवाद विरोधी स्टैंड ले, तो दुनिया में आतंकवाद का खात्मा आसान हो जाएगा, क्योंकि आतंकवाद की सबसे बड़ी पनाहगाह पाकिस्तान ही है। पाकिस्तान को चाहिए कि वह भारत पर भरोसा करे और अपनी रणनीति में आतंकवाद के इस्तेमाल को बंद कर दे, क्योंकि अब आतंकवाद उस पर पलटकर खतरनाक वार करने की स्थिति में आ गया है। जरूरी यह है कि अब पाकिस्तान अपने पड़ोसियों से ज्यादा अपना ख्याल करे और देश में राजनैतिक-प्रशासनिक स्थिरता लाए और अर्थव्यवस्था को मजबूत करे। इसके लिए पाकिस्तानी सेना को अपनी महत्वाकांक्षाओं को सीमित करना होगा, लेकिन अगर देश बिखर गया, तो कितनी ही मजबूत और समृद्ध सेना क्या कर लेगी? इस वक्त पाकिस्तान ऐतिहासिक फैसला करता है और सचमुच आतंकवाद के खात्मे के लिए जुट जाता है, तो उसे समूची दुनिया में समर्थन मिलेगा और वह एक मजबूत देश बनकर उभरेगा। लेकिन अब भी दोनों हाथों में लड्डू रखने की चतुराई करने की सोच रहा है, तो जल्दी ही वह एक बिखरा हुआ, कमजोर देश बन जाएगा। उम्मीद करनी चाहिए कि पाकिस्तान वक्त की नजाकत को समझेगा और सही फैसला करेगा।

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  • Web Title:पाकिस्तान की दिशा