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ओसामा का पतन

ओसामा बिन लादेन की मौत के साथ एक ऐसे इंसान की भी कहानी का अंत हो गया है, जिससे जुड़ी खबरें पिछले एक दशक से दुनिया भर में छाई रहीं, और वह भी तब, जबकि वह 9/11 की घटना के बाद से लोगों की निगाहों से ओझल रहा और उसके बारे में अटकलें लगाई जाती रहीं कि वह पाकिस्तान-अफगानिस्तान सरहद पर पहाड़ियों में कहीं छिपा हुआ है। कुछ के लिए हीरो और कइयों के लिए खलनायक ओसामा अपने आखिरी वक्त तक अल कायदा का प्रतीकात्मक नेता रहा, हालांकि दुनिया के सबसे खौफनाक आतंकी संगठन पर उसकी पकड़ को लेकर भी संदेह होता रहा, खासकर इसके दिन-ब-दिन के कामकाज के लिहाज से। ओसामा की मौत पर संसार भर से खुशी से लबरेज जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं, वे स्वाभाविक ही हैं और इसमें भी कोई हैरत वाली बात नहीं है कि हिन्दुस्तान और अफगानिस्तान ने अपने इस आरोप को दोहराने में कोई वक्त नहीं लगाया कि पाकिस्तान दहशतगर्दो को पनाह देता है। यदि कट्टरपंथी ताकतों को छोड़ दें, तो पाकिस्तान में भी लोगों को इस बात से राहत मिली होगी कि जिस इंसान के गुर्गे यहां-वहां मासूम लोगों की जिंदगियां खत्म करते फिरते थे, वह मर चुका है।

निस्संदेह, जिस तरह से इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया गया, उसने हमें हैरत में डाल दिया है। जिस इमारत में ओसामा रह रहा था, वह किसी सुदूर पहाड़ी घाटी में नहीं है, बल्कि शांत एबटाबाद उपनगर में बनी है और काकुल मिलिट्री एकेडमी से महज एकाधिक किलोमीटर की दूरी पर है। ऐसे में, दुनिया के सबसे वांछित व्यक्ति की मौजूदगी को भांपने में पाकिस्तान की नाकामी स्तब्ध करने वाली है। इस पूरे ऑपरेशन में हमारे सुरक्षा व खुफिया बलों की भूमिका को लेकर भी संशय बना हुआ है। कई सवाल हवाओं में तैर रहे हैं। इनमें से कुछ का जवाब तो शायद हमें आने वाले दिनों में मिल जाए। लेकिन मुमकिन है कि कई सवाल लंबे समय तक रहस्य बने रहें। बहरहाल, इस्लामाबाद के लिए तो यह पूरा प्रकरण शर्मसार करने वाला ही रहा है, आखिर वर्षों के लगातार इनकार के बाद लादेन पाकिस्तानी सीमा में पाया गया।
द न्यूज, पाकिस्तान 

 

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