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डरना किस बात से

वह एक कदम उठाते हैं और पीछे खींच लेते हैं। फिर खुद को तैयार करते हैं। फिर खुद को पीछे कर लेते हैं। यह सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा।

एक अनजान-सा डर हमें परेशान करता रहता है। डॉ. नॉम श्पेन्सर मानते हैं कि जब भी हम डरकर किसी चीज से पीछे हट जाते हैं, तो अपनी नाकामयाबी को मान लेते हैं। इसलिए डर का सामना करना जरूरी होता है। वह वेस्टरविले ओहायो में साइकोलॉजी के प्रोफेसर हैं। उन्होंने कमाल का एक उपन्यास लिखा है, ‘द गुड साइकोलॉजिस्ट।’

असल में, किसी भी चीज से भागना कोई हल नहीं है। किसी भी हल के लिए हमें उससे जूझना पड़ता है। उसका सामना करना पड़ता है। दरअसल, डर एक बंदर घुड़की की तरह होता है। अगर आप डर गए, तो बंदर और घुड़केगा। अगर नहीं डरे, तो आप बंदर से पार पा सकते हैं। कबूतर के लिए कहते हैं कि कोई खतरा देखकर वह अपनी आंखें बंद कर लेता है।

लेकिन आंखें बंद कर लेने से खतरा तो नहीं टल जाता। इसी तरह, डर से भागने पर उससे छुटकारा थोड़े ही मिल जाता है। हां, यह गलतफहमी हमें जरूर हो सकती है कि डर से निजात मिल गई। डर के साथ यही होता है। अगर हम उससे डर जाते हैं, तो वह हमें और भी ज्यादा डराता है। डर के साथ तो आंखों में आंखें डालकर बात करनी होती है।

सिर झुका लिया, तो डर जीत गया न। उससे क्या हासिल होने वाला है? ऐसा नहीं है कि कुछ लोग डरते हैं और कुछ नहीं डरते। डर किसको नहीं लगता? लेकिन डर से पार पाना होता है। उससे जूझना होता है। बिना जूझे हम उससे पार नहीं पा सकते। असल में जिंदगी जीने के मायने ही निडर होना होता है। डर-डरकर तो हम जिंदगी को ढोते हैं। लेकिन डर को जीतकर जिंदगी जीते हैं।

 

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