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ओसामा से पहले, ओसामा के बाद

आतंकी संगठन अल-कायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन जिंदा है या नहीं, अब इन अटकलों पर विराम लग गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसकी आधिकारिक पुष्टि कर दी है कि ओसामा बिन लादेन को इस्लामाबाद के पास एबटाबाद में सीआईए ऑपरेशन में मार गिराया गया। राष्ट्रपति बराक ओबामा के मुताबिक, अल-कायदा के खिलाफ कार्रवाई में यह अमेरिका की सबसे बड़ी उपलब्धि है। हो भी क्यों न, 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में हुए आतंकी हमले के करीब 10 साल बाद अमेरिका को हमले के मास्टरमाइंड को मारने में कामयाबी मिली है। इससे पहले तक अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ अपनी कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना झेल रहा था। यही नहीं, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को अरबों-खरबों रुपये की आर्थिक मदद और इन इलाकों में आतंकियों को कुचलने के लिए फौजी कार्रवाई में भी बेहिसाब रकम खर्च हो रही थी। लेकिन अमेरिकी चश्मे से बाहर देखें, तो ओसामा बिन लादेन को मार गिराना महज सांकेतिक ही है। कहा जा सकता है कि ओसामा बिन लादेन जेहादियों का प्रेरणास्रोत और आतंकवाद का सबसे बड़ा चेहरा था, जिसे अमेरिका ने खत्म कर दिया है। लेकिन इससे न तो आतंकवाद का नासूर खत्म होगा और न ही इस्लामी चरमपंथियों पर लगाम लगने वाली है। भारत, अमेरिका, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवाद का मसला यथावत रहेगा और आपसी रिश्ते भी। जहां तक अरब मुल्कों की बात है, तो वहां हालात और बदतर होंगे। और सबसे अहम यह कि इस्लाम और गैर-इस्लाम के बीच की खाई भी पटती नहीं दिख रही है।

बहरहाल, 9/11 हमले के बाद अमेरिका के आक्रामक रुख को देखते हुए अल-कायदा दबाव में आ गया था। इसके बाद तो जैसे-जैसे अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपने हमले तेज किए, अल-कायदा का जेहादियों से नियंत्रण उठता गया। साल 2005 में ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट का गठन हुआ। इसमें अल-कायदा समेत दुनिया भर के इस्लामी आतंकी संगठन शामिल हुए। मसलन, जैश-ए-मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान के आतंकी भी इस जमात में आए। इससे काफी हद तक इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा मिला और आतंकियों के बीच जेहाद सार्वभौमिक लक्ष्य बना। इस दौरान कई इस्लामी देशों से फंडिंग हुई। परमाणु हथियारों के जखीरे तक की चोरी की खबरें भी मीडिया रिपोर्टो में आईं। यानी कूटनीति के स्तर पर माना जा सकता है कि साल 2005 में ओसामा बिन लादेन को मजबूती मिली, लेकिन इससे इतर जेहादी आंदोलन और आतंकवाद स्थानीय स्तर पर एक पेशा बनकर भी उभरा। पाकिस्तान- अफगानिस्तान के कबायली इलाकों में छोटे-छोटे आतंकी संगठनों का जन्म हुआ। लोकल ग्रुपों तक बम, बारूद और विस्फोटक पहुंचाए जाने लगे। देखा जाए, तो बड़े आतंकियों का नियंत्रण टूटने लगा। ओसामा अपने लक्ष्य में सफल तो हुआ, लेकिन उनका कद छोटा हो गया। कभी तोरा-बोरा की पहाड़ियों में वह खुद को बचाता रहा, तो कभी पाकिस्तान सीमा पर। इसलिए मौजूदा आतंकवाद ओसामा बिन लादेन से काफी आगे चला गया है। ओसामा के जाने के बाद भी आतंक का बाजार चलता रहेगा, जो कि भारत और अमेरिका के लिए चिंता की बात है। एक तथ्य यह भी है कि ओसामा की मौत के बाद इस्लामी मुल्कों में अमेरिका विरोधी भावनाएं और जोर पकड़ेंगी। एक कमजोर और जिंदा लादेन अमेरिका के दृष्टिकोण से कहीं ज्यादा श्रेष्ठकर होता।

वैसे यह सवाल अपनी जगह है कि दक्षिण एशियाई कूटनीति में इससे क्या फर्क पड़ेगा और क्या अमेरिका अपने मकसद में कामयाब होने के बाद पाकिस्तान से निकल जाएगा? इसमें संदेह नहीं कि ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका और भारत को अपना शत्रु बताया था। लेकिन लादेन के जाने के बाद ऐसा नहीं है कि भारत में आतंकवाद खत्म हो जाएगा। भारत में आतंकवाद को बढ़ाने के पीछे आईएसआई और खुद पाक फौज है। इसके अलावा कई छोटे-मोटे आतंकी संगठन हैं, जिन्हें बड़े आतंकी संगठनों से पैसा मिलता है। खुद भारत में ही कई आतंकी संगठन बन गए हैं, जिनके स्लीपर सेल लगातार काम कर रहे हैं। ओसामा के कमजोर पड़ने के बावजूद भारत में सीमा पार से घुसपैठ बढ़ी है। दूसरी ओर पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर तालिबानी लड़ाकों और हक्कानी ग्रुप का खौफ बढ़ा है। इसलिए दक्षिण एशियाई राजनीति पहले की तरह ही गड्ड-मड्ड रहेगी। हर संधि, हर बैठक, हर सम्मेलन और हर सेमिनार में आतंकवाद का मुद्दा बना रहेगा। नाटो का ड्रोन हमला भी कबायली इलाकों में जारी रहेगा। नाटो की सेना ने 2014 में अफगानिस्तान से हटने का फैसला लिया है और वे उस पर कायम रहेंगे, क्योंकि तब तक इन इलाकों में अमेरिकी हथियारों को खपाने का भी दबाव है।

बहरहाल, आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान की दोहरी भूमिका जगजाहिर हो चुकी है। एक तरफ पाकिस्तान नाटो को मदद पहुंचा रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ  वह आतंकियों के प्रति सहानूभुति भी जताता रहा है। इस्लामाबाद के पास दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी ओसामा बिन लादेन महल बनाकर रह रहा था और पाकिस्तान इससे बेखबर रहा। ओसामा की मौजूदगी की जानकारी भी अमेरिका से साझा नहीं की गई थी। सीआईए के ऑपरेशन से भी पाकिस्तान ने खुद को अलग रखा। लेकिन बराक ओबामा ने पाकिस्तान को धन्यवाद देकर मुहिम में गिलानी सरकार को शामिल कर लिया है। दरअसल, अमेरिका की चिंता यह थी कि वह पाकिस्तान की विदेश नीति को प्रभावित कर रहा था। इसलिए एक आम सहमति का दिखावा जरूरी था। पर वास्तव में, आतंकवाद पर पाक सरकार की पोल खुल चुकी है। और आने वाले साल में अमेरिका उसे अलग-थलग भी कर सकता है। हाल ही में पाकिस्तान दौरे पर गए अमेरिकी कमांडर मेलोन ने आईएसआई को आतंकियों का मालिक बताया था।

हालांकि ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद वैश्विक समुदाय को किसी दूसरी मुहिम को शुरू करने से पहले प्रतिक्रियाओं का इंतजार करना चाहिए। यानी वक्त आ गया है कि दुनिया भर की जनता को सुना जाए। देखना होगा कि ओबामा के समर्थन में और ओसामा के समर्थन में कितने लोग, कितनी सरकारें, कितने संगठन हैं। ये भी देखना होगा कि आतंकवाद का क्रूर चेहरा इस्लामी आतंकवाद का वृहत्तर रूप नहीं ले। छोटे आतंकी संगठनों को मिलने वाली फंडिंग पर रोक के तत्काल उपाय खोजने होंगे, वर्ना हजारों लादेन पैदा हो सकते हैं। अगर लादेन के जाने से किसी तूफान के आने की आशंका है, तो उसकी आहट को सुनने का भी यही मुफीद वक्त है।

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