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चौकन्ना रहने का समय

ओसामा बिन लादेन के मारे जाने का महत्व इसलिए तो है ही कि हमारे वक्त में वह आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रतीक था। इसलिए भी कि उसकी मौत से जमीनी स्तर पर कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकते हैं। अमेरिकी इस बात पर खुश हैं कि जिस व्यक्ति के नेतृत्व में 9/11 के आतंकवादी हमले हुए, उसे आखिरकार उन्होंने मार गिराया। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की गिरती लोकप्रियता को इस घटना से एक बड़ा सहारा मिलेगा और संभवत: अफगानिस्तान से निकलने की योजना पर भी इसका अच्छा असर हो। लेकिन यह भी याद रखना होगा कि लादेन कितना ही बड़ा नाम हो, अल-कायदा इन दिनों कोई बहुत मजबूत संगठन नहीं रह गया है। अफगानिस्तान में चल रहे गृह युद्ध ने उसे इतना कमजोर कर दिया है कि वह कोई बड़ा आतंकवादी हमला नहीं अंजाम दे सकता। इस वक्त ज्यादा बड़ा खतरा तालिबान है, खासकर उसका जलालुद्दीन हक्कानी गिरोह, जिसे पाकिस्तानी सेना का समर्थन प्राप्त है, इसके अलावा पिछले बरसों में लश्करे तैयबा एक बड़े आतंकवादी गिरोह की तरह फैला है। लश्करे तैयबा पाकिस्तान में आईएसआई की छत्रछाया में भारत के खिलाफ इस्तेमाल के लिए बना था, लेकिन अब उसकी अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति है। अल-कायदा भले ही आज बड़े हमले नहीं कर सकता, लेकिन उसके एजेंट दुनिया भर में हैं, जो अपने स्तर पर आतंकवादी कार्रवाई कर सकते हैं। अब एक बड़ा खतरा यह होगा कि उसकी मौत का बदला लेने के लिए और अपनी ताकत दिखाने के लिए ये सारे गिरोह आतंकवादी कार्रवाइयां करें। इन कार्रवाइयों के सबसे बड़े निशाने भारत और पाकिस्तान के आम जन हो सकते हैं, दोनों देशों में आईएसआई और लश्कर के लिए हमले करना आसान है। भारत के लिए यह काफी नाजुक वक्त है, एक तरफ वह आतंकियों के निशाने पर है, तो दूसरी तरफ यह पता नहीं है कि अब अमेरिका की अफगान-पाक में रणनीति क्या होगी और आईएसआई का अगला कदम क्या होगा।

अमेरिकी सेना की कार्रवाई में लादेन के मारे जाने से पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान की काफी किरकिरी हुई है, भले ही पाकिस्तान सरकार जाहिर तौर पर इसे आतंकवाद विरोधी जंग की कामयाबी बता रही है। इससे एक तो यह बात साफ हुई कि लादेन कबायली इलाकों में किसी गुफा में नहीं, इस्लामाबाद से कुछ दूरी पर फौजी छत्रछाया में रह रहा था। दूसरी यह बात अपनी जनता के गले उतारना पाकिस्तान सरकार के लिए मुश्किल होगा कि अमेरिकी सेना ने अपने बूते पाकिस्तानी राजधानी के पास इतनी बड़ी सैनिक कार्रवाई कर डाली। दोनों ही बातों के लिए दलील ढूंढ़ना पाकिस्तान सरकार के लिए भारी पड़ेगा। अमेरिका की जल्दी से अफगानिस्तान से निकलने की कोशिश में पाकिस्तानी सेना उस पर यह दबाव डाल रही थी कि यह वापसी पाकिस्तान की मनचाही शर्तो पर हो। अब इस घटना के बाद दबाव पाकिस्तान पर आ गया है। इस दबाव को कम करने के लिए पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान फिर से भारत को निशाना बना सकता है। वैसे भी पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान की कोशिश यह रहती है कि जब शांति प्रक्रिया और बातचीत का दौर शुरू हो, तो कोई आतंकवादी कार्रवाई फिर से संबंध खराब कर दे। लादेन की मौत ऐसी घटनाओं के लिए एक बहाने की तरह इस्तेमाल हो सकती है, और लश्करे तैयबा जैसे संगठन फिर आक्रामक हो सकते हैं। लादेन की मौत आतंकवाद विरोधी लड़ाई में एक बड़ी घटना है, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में इससे स्थिति कम से कम अभी तो ज्यादा विस्फोटक हो गई है। भारत को इसकी वजह से ज्यादा चौकन्ना रहना होगा।

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