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रोक लेने का फर्क

एक जरूरी मीटिंग चल रही थी। उसमें एक अहम फैसला लेना था। काफी देर हो गई थी। बैठना भारी हो रहा था और वॉशरूम उन्हें बुला रहा था। लेकिन..
फैसले की घड़ी है। और आपको वॉशरूम की याद सता रही है। ऐसे में हम क्या करेंगे? कुछ लोग कहते हैं कि अपने को रोकना नहीं चाहिए। लेकिन डॉ. सीन बीलॉक का मानना है कि अगर किसी फैसले के वक्त आपको सू सू आ रही है, तो उसे रोकने की आदत डालनी चाहिए। उससे आपकी फैसला लेने की ताकत बेहतर होती है। यानी हालात कुछ भी हों, हम बेहतर फैसला ले पाते हैं। हम बहकते नहीं हैं। वह शिकागो यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी की प्रोफेसर हैं। उनकी चर्चित किताब है, ‘चोक : व्हाट द सीक्रेट्स ऑफ द ब्रेन रिवील अबाउट गेटिंग इट राइट व्हेन यू हैव टू।’

एक रिसर्च का जिक्र बीलॉक करती हैं। उसमें लोगों को खूब पानी पिलाया गया, ताकि सू सू जोर से लगे। फिर उन्हें फैसला करने को कहा गया। दूसरे ग्रुप को बिना किसी परेशानी के फैसला करना था। पता चला कि सू सू वाले ग्रुप ने बेहतरीन फैसले लिए थे।

असल में फैसले लेते हुए हमें अपनी भावनाओं को काबू में रखने की जरूरत होती है। अगर हम भावनाओं में बहकर फैसले करेंगे, तो दिक्कत ही आएगी। सू सू रोकने का मतलब है कि हम रुककर और ठहरकर कोई फैसला कर सकते हैं। असल में, फैसले लेते हुए हमें अपने को काफी हद तक रोकना पड़ता है। सू सू रोकना कोई मुश्किल काम नहीं है। लेकिन उसे किसी खास मौके पर रोकने की आदत से हमारी जिंदगी पर खासा असर पड़ता है। एक तो तात्कालिकता हमारे फैसले पर हावी नहीं होती। दूसरे, हम सिर्फ अपने बारे में ही नहीं सोचते। तीसरे वह करते हैं, जो ज्यादा जरूरी है। फैसले लेने की हमारी आदत में ये तीनों चीजें बेहद मायने रखती हैं। तो क्या सोच रहे हैं आप?

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