DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कॉल सेंटर में काम, जरूरी है बीच-बीच में आराम

कॉल सेंटर में काम, जरूरी है बीच-बीच में आराम

कॉल सेंटर की नौकरियों ने युवाओं को एक अलग ही जीवनशैली दी है, जिसमें वे रात भर काम करते हैं और दिन में सोते हैं। ऐसे में सावधानी न बरती जाए तो बीमारियां घेर लेती हैं।

कॉल सेंटर्स में आज लाखों युवा काम करके अपने जीवन के सुनहरे सपने बुन रहे हैं। लेकिन कॉल सेंटर की नौकरियों ने युवाओं को एक अलग ही तरह की जीवनशैली दी है। एक ऐसी जीवन शैली, जिसमें वे रात भर काम करते है और दिन में सोते हैं। प्रकृति के इस विपरीत चक्र के चलते आज ऐसे युवाओं में अनेक तरह की बीमारियां भी पाई जा रही हैं। लेकिन अगर कॉल सेंटर्स की कार्य शैली को ध्यान में रखते हुए थोड़ी सावधानी बरती जाए तो इस करियर से जुड़े लोगों के सपनों में और भी रंग सज सकते हैं।

कुछ समय पहले हुए सर्वे देखें तो आपको आश्चर्य होगा कि कॉल सेंटर में काम करने वाले युवाओं को युवावस्था में ही बड़ी उम्र की बीमारियों से ग्रस्त देखा गया है। सर्वे के अनुसार कॉल सेंटर में काम करने वाले लड़के-लड़कियों के लिए तनाव, कब्ज और डिप्रेशन तो आम बीमारियां हैं। कॉल सेंटर के 36 प्रतिशत युवा एक्यूट डिजीज से ग्रस्त हैं। ये बीमारियां नींद पूरी न होने से होती हैं। इससे एसिडिटी, पाचन शक्ति का कमजोर होना एवं चिड़चिड़ापन आ जाता है। 27 प्रतिशत से अधिक लड़के-लड़कियां लाइफ स्टाइल डिजीज से ग्रस्त हैं। यह बीमारी दिनचर्या में फेरबदल से आती है। ये लोग रात भर काम कर दिन में सोते हैं। तीन प्रतिशत युवाओं को क्रोनिक इंफेक्शन है, तो 12 प्रतिशत नौजवानों को अन्य बीमारियों ने घेर रखा है। इतना ही नहीं, युवाओं की बीमारियों को देखते हुए कॉल सेंटर्स में ‘सिक रूम’ बनाए जा रहे हैं।

कॉल सेंटर्स में काम करने वाले युवाओं में मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन तथा इनसे उपजी ढेर सारी बीमारियां दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं। सारी रात जागने के बाद दिन में नींद पूरी कर पाना लगभग नामुमकिन होता है। इस कारण सुस्ती, चिड़चिड़ापन तथा तनाव जैसी बीमारियां आम बात होती हैं। लाइफ स्टाइल बदलने से युवाओं में और भी कई भयंकर बीमारियां देखने को मिल रही हैं, जैसे- गाल ब्लैडर का कैंसर। इसका सबसे बड़ा कारण कम उम्र में असंतुलित आहार, तंबाकू व अल्कोहल का सेवन है, जो पियर प्रेशर के दबाव के कारण चलन में बढ़ता जा रहा है। इसमें गाल ब्लैडर में स्टोन भी शामिल है। ये ट्रेंड ज्यादातर वर्क कल्चर में आए परिवर्तन के कारण हैं। इसके लक्षणों में हैं भूख कम लगना, वजन कम होना और पेट के दाहिने तरफ दर्द होना।

इसके अलावा एक और बीमारी कॉल सेंटर में काम कर रहे लोगों में देखने को मिल रही है, यह है ‘अकूस्टिक शॉक’ का शिकार होना। इसमें सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ‘अकूस्टिक शॉक’ अस्थायी और स्थायी दोनों तरह की परेशानियों को जन्म देता है। इससे कान के काम करने की क्षमता पर तो नकारात्मक असर पड़ता ही है, साथ ही तंत्रिका प्रणाली भी बुरी तरह से प्रभावित होती है।

बहरापन एक अन्य बीमारी है। इसमें कानों के अंदर सूक्ष्म तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं, जो ध्वनि संकेतों को मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं। 80 डेसिबल से अधिक ध्वनि तंत्रिका कोशिकाओं को अक्षम बना सकती हैं और व्यक्ति बहरेपन का शिकार हो जाता है। ध्वनि के साथ ईयरफोन, हेडफोन, मोबाइल फोन और आईपॉड आदि की चुंबकीय तरंगें भी तंत्रिका कोशिकाओं को नष्ट करती हैं। इस स्थिति में व्यक्ति केवल ऊंची आवाज ही साफ सुन सकता है। धीमी आवाज उसे सुनाई नहीं देती। इसे ‘हाई फ्रिक्वेंसी हियरिंग लॉस’ कहते हैं।

विशेषज्ञों की मानें तो कॉल सेंटर, बीपीओ या ऐसे संस्थानों में कार्यरत लोगों को खास तौर पर सतर्कता बरतनी चाहिए, क्योंकि इन्हें कानों से जुड़ी बीमारी आसानी से हो सकती हैं। बेहतर होगा कि हर घंटे कम से कम दस मिनट का ब्रेक अवश्य लें। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में सर्वाइकल, स्लिप डिस्क, मानसिक तनाव, हर समय थकान की शिकायत, चिड़चिड़ापन, खराब व्यवहार, ड्रग्स और एल्कोहल की बुरी आदत पड़ना, डिप्रेशन, अनिद्रा की शिकायत भी होती है। हालांकि आज हर क्षेत्र में काम के दबाव से दिनोंदिन स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे में युवाओं को काम के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य पर भी पूरा ध्यान देना बेहद जरूरी है।  

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:कॉल सेंटर में काम, जरूरी है बीच-बीच में आराम