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सत्ता का मद जो न कराए

सत्ता में दंभ होता है। पिछले दिनों अलग-अलग सरकारों का अलग-अलग दंभ देखने को मिला। एक की सत्ता दिल्ली में, दूसरे की गुजरात में। एक के नेता देश के प्रधानमंत्री, दूसरा प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब पाले हुए। एक तस्वीर अत्यंत शालीन, तो दूसरा गुरूर से लबालब। एक का नाम मनमोहन सिंह, तो दूसरे का नरेंद्र मोदी। एक को मुरली मनोहर जोशी पसंद नहीं, तो दूसरे को संजीव भट्ट। दोनों की राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि एकदम अलग, मिजाज अलग, विचारधारा अलग, पर काम का तरीका एक। क्योंकि सत्ता का स्वरूप एक है। सत्ता अपने स्वरूप में ही हठी है, दंभी है, दमनकारी है।

मुरली मनोहर जोशी बीजेपी के वरिष्ठ नेता हैं। विद्वान। संसद की लोक लेखा समिति, यानी पीएसी के अध्यक्ष। कुछ समय पहले, जब 2-जी घोटाले की जांच के लिए बीजेपी ने बवाल काट रखा था, तब मनमोहन सिंह की सरकार और कांग्रेस के नेताओं को जोशीजी अच्छे लगते थे। मनमोहन सिंह ने कहा था कि पीएसी अगर चाहे, तो वह कमेटी के सामने जांच के लिए पेश हो जाएंगे।

पीएसी ने प्रधानमंत्री को बुलाना उचित नहीं समझा और अपनी रिपोर्ट में एक तरह से उन्हें क्लीन चिट भी दे दी। बस इतना लिखा कि उनके अपने ही कार्यालय ने उन्हें गुमराह किया। गलती उनकी नहीं, उनके दफ्तर की है, उनके मंत्रियों की है। फिर भी सत्ता पक्ष ने पीएसी की बैठक में जिस तरह से धावा बोला, जोशी को हटाने का प्रपंच किया, वह समझ के परे है।

यह समझ में नहीं आया कि जोशी की कमेटी ने ऐसी कौन-सी नई बात कह दी, जो सरकार को नागवार लगी? ऐसा कौन-सा सत्य या तथ्य था, जो पब्लिक को पता नहीं था? सीबीआई और ईडी लगभग वही बातें कर रही हैं और उनकी रिपोर्टों के आधार पर ही राजा हों या कॉरपोरेट घरानों के नौकरशाह-मालिक, सभी जेल जा रहे हैं। जिस जोशीजी की तारीफ कांग्रेस कर रही थी, अचानक क्यों उनमें सत्ता पक्ष को डिक्टेटर-पूर्वाग्रही नजर आने लगा? और उनको हटाना जरूरी हो गया? पीएसी के अध्यक्ष को पहली बार इस तरह से हटाया गया या यूं कहा जाए कि अपमानित किया गया।

यहां सवाल जोशी या बीजेपी का नहीं है, सवाल लोकतंत्र और संसदीय परंपराओं का है। मेरी नजर में पीएसी में जो कुछ भी हुआ, वह मामूली घटना नहीं है। वह कहीं न कहीं भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को अस्थिर करती है, उसे कमजोर बनाती है। मैं नहीं मानता कि कांग्रेस को इस बात का एहसास नहीं है। राजनीति में बिना नफे-नुकसान के कुछ नहीं होता, लेकिन जितनी बार मैं इस घटना के बारे में सोचता हूं, मुझे कुछ समझ में नहीं आता।

मुझे यह बिल्कुल नहीं लगता कि कैग से ज्यादा पीएसी की रिपोर्ट सरकार की साख को नुकसान पहुंचाती। और न ही इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार के लिए नया सिरदर्द पैदा होता। ज्यादा से ज्यादा बीजेपी और विपक्ष इस बहाने सरकार को एक दो दिन घेरती और फिर चुप हो जाती है। यह भी हो सकता था कि संसद की दूसरी रिपोर्टो की तरह इस रिपोर्ट को भी महत्व नहीं दिया जाता।

ऐसे में, बस एक ही बात समझ में आती है कि सारी कार्रवाई किसी को सबक सिखाने के मकसद से की गई और सरकार विरोधी तंत्र को यह बताने के लिए भी कि अब सरकार के लोग भी चुप बैठने वाले नहीं हैं और जो भी उस पर हमला करेगा, वे भी घाव खाने के लिए तैयार रहें। इसी को मैं दंभ कहता हूं। बदले की भावना से किया गया काम।

पिछले दिनों कुछ इसी तरह का रवैया अन्ना के अनशन के बाद अपनाया गया था। ड्राफ्ट कमेटी पर झुकने के बाद अचानक सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से कमेटी के गैर सरकारी सदस्यों पर हमले हुए। कमेटी के पहले तक किसी भी सदस्य पर कोई आरोप नहीं, और चंद दिनों में सभी को बेईमान साबित करने की कोशिश। सबके खिलाफ कुछ न कुछ छपने लगा। तेवर यह कि अब हमें इन्हें बताएंगे कि भ्रष्टाचार क्या होता है और आरोप लगने पर कितनी तकलीफ होती है। और सबसे बड़ी बात कि तुम हो कौन? हमें आईना दिखाओगे? सत्ता का दंभ। ऐसे में, जब मुरली मनोहर जोशी का मसला आया और अनावश्यक आक्रामकता दिखी, तो दोनों बातों को जोड़े बिना नहीं रह पाया।

कुछ ऐसा ही अंदाज नरेंद्र मोदी का भी है। गुजरात में अनेक अफसर हैं, जो वर्ष 2002 के बाद से मोदी के गुस्से की सजा झेल रहे हैं। यहां सबका नाम देने की जरूरत नहीं है। ताजा शिकार बने हैं आईपीएस संजीव भट्ट, जिन्होंने नौ साल बाद मोदी के खिलाफ बयान देने हिमाकत की और कहा, ‘27 मई को मुख्यमंत्री ने अफसरों को साफ कहा था कि हिंदुओं के गुस्से को बाहर आने दो। प्रशासन दंगों के दौरान हिंदू और मुसलमान के बीच संतुलन साधने की अपनी पुरानी परंपरा का निर्वाह इस बार न करे।’ यह बयान मोदी के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है। लिहाजा संजीव को प्रताड़ित करने का काम शुरू हो गया है।

संजीव भट्ट ने शिकायत की है कि उनको लगातार धमकियां मिल रही हैं, उनकी जान को खतरा है, उन्हें और उनके परिवार को अतिरिक्त सुरक्षा मिलनी चाहिए। लेकिन हुआ उल्टा। उनकी मौजूदा सुरक्षा को ही हटा लिया गया। जिस अफसर को दिलेरी का इनाम मिलना चाहिए, उसे मरने के लिए उसके हाल पर छोड़ दिया गया। यानी अगर आप मोदी से पंगा लेते हैं, तो फिर राज्य सरकार, जिसकी हर नागरिक की जान की सुरक्षा करने की संवैधानिक जिम्मेदारी है, उससे सुरक्षा की उम्मीद न करें।

अब इसे क्या कहेंगे? मोदी के पहले दिल्ली में भी बीजेपी ने तहलका कांड के नायकों के साथ कुछ ऐसा ही सुलूक किया था। तब तहलका के रिपोर्टर अनिरुद्ध बहल को जेल भेजने की पूरी साजिश रची गई, उनके सहयोगी कुमार बादल को एक दूसरे मामले में फंसाकर हवालात में बुरी तरह टॉर्चर किया गया और तहलका की प्रमोटर कंपनी को तो दिवालिया ही बना दिया गया। उस वक्त प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। अत्यंत मृदुभाषी और शालीन।

ऐसे में, मनमोहन सिंह हों या नरेंद्र मोदी या फिर अटल बिहारी वाजपेयी, ये सत्ता में आते ही बदल जाते हैं। सत्ता में आते ही शालीनता का लबादा उतर जाता है, और नया मुखौटा चस्पां हो जाता है। क्योंकि सत्ता स्वभाव से दंभी है। किसी ने कहा है- सत्ता भ्रष्ट करती है, संपूर्ण सत्ता पूरी तरह से। ऐसे में मनमोहन सिंह की सरकार से शालीनता की उम्मीद क्यों करें मुरली मनोहर जोशी? कल सत्ता में आते ही उनके सुर भी तो बदल जाएंगे।

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