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बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना

आयुष्मान प्रिंस विलियम और सौभाग्यकांक्षिणी केट मिडलटन के शुभ पाणिग्रहण संस्कार टेलीविजन के माध्यम से विश्व भर के मध्य वर्ग में ऐसी कामना जगा गया है, जो कभी पूर्ण नहीं होगी, लेकिन जिसे पूर्ण करने की कोशिशों में कई छल-प्रपंच और वंचनाएं होती रहेंगी। इस शादी का दृश्य यह टीस भी जगा रहा था कि किसी न किसी दिन केट मिडलटन को अपने सिर पर वह कोहेनूर मणि भी धारण करनी है, जो हमारी ही खदानों से उपजी है, और जिसे हमसे छीनकर ले जाया गया था।

सड़क पर गुजरती चमचमाती महंगी कार, आलीशान मकान और बेशकीमती लिबास पहनकर पार्टी में शामिल व्यक्ति को हम कनखियों से ही देखते हैं। हम उसे देखना तो चाहते हैं, लेकिन यह भी देखते हैं कि कोई देखता न हो। पर जब कोई जलवा वैश्विक उत्सव का रूप ले लेता है, तो उसे देखने में हमारी झिझक जाती रहती है, क्योंकि हमारे बगल वाला भी उसे उतनी ही तन्मयता के साथ देख रहा होता है।

पराई छटा को बेझिझक और तन्मय होकर देखने लगना घातक है। तब हम अपना स्वाभिमान, अपने व्यक्तिगत सपने और अपना वर्तमान यथार्थ सब कुछ भूलकर एक ऐसे मायालोक में पहुंच जाते हैं, जो हमारा नहीं है, लेकिन जो हमें हर ले जाता है। सदियों की ब्रिटिश दासता से हमने एक लंबे युद्ध के बाद विजय पाई है। इस युद्ध में हमारा सबसे बड़ा हथियार आत्मसम्मान था, जिसे हम समय-समय पर ताक पर रख देते हैं।

ब्रिटेन और उस जैसे देशों के लिए केट-विलियम की शादी को वैश्विक महोत्सव बनाना इसलिए भी जरूरी है   कि उनके पास मुग्ध और संतुष्ट होने लायक बहुत सीमित विषय हैं, जबकि हमारे गौरव के लिए हमारे पास बहुत अधिक प्रसंग हैं, जैसे कि भाषाओं और संस्कृतियों की बहुलता वाला एक संयुक्त समाज, खदबदाते नीले समुद्र और इतिहास तक को चकमा दे देने की क्षमता रखने वाले मायावी रेगिस्तान। क्यों न हम इस अवसर पर इतिहास के उस अध्याय को याद करें कि जब हमारे एक अधनंगे फकीर ने समूचे ब्रिटिश राजवैभव को अपने एक छोटे से कृत्य के जरिये परास्त कर दिया था।

पिछली सदी के तीसरे दशक में गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन पहुंचे गांधी के सामने शर्त रखी गई थी कि वह ‘वेल ड्रेस्ड’ हुए बगैर सम्राट और साम्राज्ञी के सम्मुख प्रस्तुत नहीं हो सकते। तब गांधी ने जवाब दिया कि वह सम्राट के नहीं, बल्कि अपनी जनता के प्रतिनिधि हैं और वैसी ही ड्रेस पहनेंगे, जैसी देश की अधिकांश प्रजा पहनती है। 

लुइस फिशर लिखते हैं, कि जब वह अधनंगा फकीर अपनी अनावृत टांगों से ब्रिटिश राजमहल की सीढ़ियां चढ़ रहा था, तो ब्रिटिश सत्ता उसी दिन पराजित हो चुकी थी, क्योंकि इससे पहले ऐसा कभी हुआ ही नहीं था। जोड़ियां यदि सचमुच आसमान में बनती हैं, तो उनके संयुक्त होने की औपचारिकता पर हम क्यों आसमान अपने सिर पर उठाएं?

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