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बड़े आदमी की पहचान क्या है?

हमारे घर में सत्य साईं बाबा के शरीर त्यागने से शोक का वातावरण है। पत्नी ने एक बार अपनी दोस्त के यहां पूजा-अर्चना के बाद बाबा की तस्वीर पर प्रगट भभूति का प्रसाद माथे पर लगाया था। वह तब से वह सत्य साईं के भक्त हैं। हमारे माचिसनुमा फ्लैट में सत्य साईं का अभय मुद्रा में एक बड़का चित्र भी लगा है। उस चित्र के सामने रोज अगरबत्ती सुलगाई जाती है और पत्नी श्रद्धा और निष्ठा से शीश नवाती हैं।

हम पप्पू को समझाते हैं कि सत्य साईं बाबा एक सिद्ध आध्यात्मिक हस्ती हैं। समाज सेवक हैं। उन्होंने अपने गांव पुट्टापर्थी के आस-पास के सूखाग्रस्त क्षेत्र में पानी का प्रबंध ही नहीं किया, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, सड़क आदि के निर्माण से उसे ऐसा विकसित किया है कि उसके कायाकल्प को देख लोग दांतों तले उंगली दबाते हैं। उनकी कीर्ति देश और दुनिया में व्याप्त है।

इस विरदावली के बाद हम पप्पू को बताते हैं कि तुम्हारी मां बाबा के निधन से खिन्न हैं। पप्पू अपने कंधें से बैग उतार देते हैं, ‘इतने बड़े आदमी थे साईं बाबा, तो स्कूल क्यों खुला होगा?’ हमने उससे कहा कि राष्ट्रीय शोक प्रधानमंत्री, मंत्री, गवर्नर जैसे सत्ताधारियों के स्वर्गवास पर होता है, बाबा जैसे महान समाज सेवकों और आध्यात्मिक शिखर-पुरुषों के शरीर छोड़ने पर नहीं।

पप्पू बोले कि असली बड़ा आदमी वही है, जो जिंदा रहने पर लालबत्ती और सुरक्षा के घेरे में चले और मरे, तो एक-दो दिन की छुट्टी देकर मरे। पत्नी को पप्पू की अंतिम चोट आस्था पर कील-सी चुभी, ‘बकवास बंद करो। बाबा की तुलना कुरसी-काबिजों से करना उनका अपमान है। वह भी एक दिन की छुट्टी के वास्ते!’

पप्पू अनखाए तो, पर बैग लटकाकर हमारे साथ चल दिए। हम पूरे रास्ते सोचते रहे कि वर्तमान निरंकुश सत्ता और नि:स्वार्थ समाज सेवा में क्या श्रेष्ठ है? हमारे महंगे स्कूल क्या सिर्फ तोता-रटंत, यूनिफॉर्म और पाठय़-पुस्तकों के नाम पर लूट और निजी टय़ूशन जैसी कोरी कमाई का पाठ ही छात्रों को पढ़ाते हैं? जैसे सेन्सेक्स बाजार का मानक है, वैसे ही भविष्य में बड़प्पन का बैरोमीटर क्या सिर्फ राष्ट्रीय शोक की अवधि होनी है!

 

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