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अपने को खुश करना

कल ही एक पार्टी में उनकी तारीफ में कसीदे काढ़े जा रहे थे। उस वक्त तो उन्हें अच्छा ही लग रहा था। लेकिन घर लौटते हुए उस तारीफ की खुमारी गायब होने लगी। वह सोचते रहे कि लोग उन्हें बहुत खुश क्यों समझते हैं?

हम खुश रहना चाहते हैं। लेकिन डॉ. क्रिस्टोफर एलेक्जेंडर का मानना है, ‘अपने को खुश करना मुश्किल होता है। यह बहुत आसान चीज लगती है। लेकिन वह दुनिया की सबसे मुश्किल चीज है। उसकी वजह है कि हम अपने भीतर के साथ बहुत आराम से नहीं रहते।’ बर्कले की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में आर्किटेक्चर के प्रोफेसर हैं क्रिस्टोफर। उन्हें कंप्यूटर साइंस में पैटर्न लैंग्वेज का जनक कहते हैं। उनकी मशहूर किताब है, ‘द ल्यूमिनस ग्राउंड : द नेचर ऑफ ऑर्डर।’

कभी-कभी हम ऐसे मुकाम पर होते हैं, जब हमें खुश होना चाहिए। लेकिन हम खुश नहीं होते। दरअसल, हम अपने भीतर को जान ही नहीं पाते। उसके साथ हमारा रिश्ता बेहतर नहीं होता। उसके साथ हम बेहद आरामदेह नहीं होते। शायद इसीलिए हम खुशी को महसूस नहीं करते।

फिर खुश रहने का मतलब अपने को संतुष्ट करना होता है। दूसरे को संतुष्ट करना आसान होता है। उसे तो हम चला सकते हैं। लेकिन अपने को कैसे चलाएंगे? ऐसा नहीं है कि हम अपने से झूठ नहीं बोल सकते। लेकिन कब तक? असल में अपने को खुश करने में सबसे बड़ी दिक्कत यही आती है कि उस भीतर को संतुष्ट कैसे किया जाए? आखिर खुशी भीतर से आती है और हम उसे बाहर ढूंढ़ रहे होते हैं?

भीतर की यात्रा बीहड़ होती है। उसे जब अपनी मंजिल का कोई पड़ाव मिलता है, तो खुशी मिलती है। और यह पड़ाव आसानी से नहीं मिलता। शायद इसीलिए अपने को खुश रखना आसान नहीं होता। हममें अनंत संभावनाएं होती हैं। लेकिन उसके आसपास भी हम पहुंच नहीं पाते। अब बाहर तो कोई भी बहाना या मजबूरी बताई जा सकती है। लेकिन अपने भीतर का क्या करें?      

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