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कीचड़ में मज

अगर कोई ध्यान से सूअर को कीचड़ में लोटते हुए देखे, तो उसे पता चलेगा कि सूअर के लिए वह बड़े फुरसत और इत्मीनान का वक्त है। यह बात और है कि सूअर को इतने ध्यान से देखने के लिए फुरसत और इत्मीनान किसे है? लेकिन ऐसे लोग भी हैं, जो सूअर को भी ध्यान से देखते हैं और उसका बाकायदा अध्ययन करते हैं। 

ऐसे ही एक वैज्ञानिक नीदरलैंड के डॉ. मार्क ब्रेक हैं, जिन्होंने इस विषय पर अध्ययन किया है कि सूअर कीचड़ में क्यों लोटते हैं। एक वजह तो वैज्ञानिक बहुत पहले से जानते हैं कि सूअर उन स्तनधारी पशुओं में से है, जिनकी त्वचा में पसीने की ग्रंथियां नहीं होतीं, इसलिए वे अपने शरीर को ठंडा रखने के लिए कीचड़ में लोटते हैं।

ऐसे ही दूसरे स्तनधारी पशुओं में दरियाई घोड़ा है और ह्वेल भी है, जो विज्ञान की भाषा में मछली नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा स्तनधारी पशु है। इसके अलावा एक और कारण है, जिसकी वजह से कुछ जीव कीचड़ में लोटते हैं, तो कुछ जीव धूल में लोटते हैं, जिनमें हिरन भी शामिल हैं। डॉ. ब्रेक का कहना है कि इस तरह वे अपनी गंध मिट्टी में छोड़ते हैं और प्रजनन के लिए अपने साथी को आकर्षित करते हैं।

लेकिन उनका कहना है कि एक और वजह से सूअर कीचड़ को पसंद करते हैं। उद्विकास का यह एक तथ्य है कि जमीन पर रहने वाले, रीढ़ की हड्डी वाले जीवों का विकास मछलियों से हुआ है। यह जीव विज्ञान की एक दिलचस्प कहानी है कि कैसे जलचर जीव पहले उभयचर यानी जमीन और पानी, दोनों में रहने वाले मेंढक जैसे जीवों में बदले और उनसे जमीन पर चलने वाले जीवों का विकास हुआ।

डॉ. ब्रेक के शोध के मुताबिक, कहीं गहरे में सारे जीवों में पानी के प्रति एक लगाव रह गया, क्योंकि सभी पानी में मछलियों से विकसित हुए थे। लेकिन जमीन पर आने के बाद पानी के आसपास रहना खतरनाक था, क्योंकि शिकार होने की आशंका पानी के पास ज्यादा थी। जो जीव पानी के पास रहने लायक थे, उनमें उथले पानी और कीचड़ के प्रति लगाव बना रह गया।

जंगली सूअर अपेक्षाकृत सुरक्षित जीव है, क्योंकि वह काफी बड़ा और आक्रामक होता है और उसके दांत पैने होते हैं। इसी तरह दरियाई घोड़े को भी दूसरे जीवों से खतरा नहीं होता। भैंस भी इसीलिए पानी में जाती है, लेकिन गाय नहीं जाती। जंगली भैंस जंगल के सबसे खतरनाक प्राणियों में से एक है। कहा जाता है कि ह्वेल इसीलिए जमीन पर आई, लेकिन यहां उसका मन रमा नहीं और बाद में वह वापस पानी में लौट गई। इसके बाद वह फिर से मछली कहलाने लगी। अगर कोई सबसे लंबी घर वापसी कहला सकती है, तो यही है।
 
इसका अर्थ यह हुआ कि ऐसा नहीं है कि सूअर की त्वचा में पसीने की ग्रंथियां नहीं होतीं, सिर्फ इसीलिए वह कीचड़ में लोटता है। बुनियादी बात यह है कि चूंकि वह कीचड़ में रह सकता है, इसलिए उसे पसीने की ग्रंथियों की जरूरत नहीं होती। इसीलिए डॉ. ब्रेक का कहना है कि सूअर या दूसरे जीवों के कीचड़ में लोटने की व्यावहारिक वजहें जो भी हों, लेकिन सबसे मूल कारण यह है कि कीचड़ में रहना सूअर के लिए अपने आप में खुशी का सबब है।

उसके लिए वह ऐश और आराम का मामला है। और उसके विकास की सारी प्रक्रिया को देखें, तो यह कीचड़ ही उसका कंफर्ट जोन भी है। आखिरकार उसने धरती पर आकर भी, अपने पांवों से चलना सीख कर भी, पानी से अपने जुड़ाव को बनाए रखा। या यूं भी कह सकते हैं कि वह विकसित तो हुआ, लेकिन उसने खुद को अपने पूर्वजों की परंपरा से जोड़े रखा। इसीलिए सूअर हों या भैंस, कीचड़ में इत्मीनान से पड़े रहते हैं, कोई नाक-भौं सिकोड़ना चाहे, तो सिकोड़े।

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