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चिंता का सबब

ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस के चेयरमैन सैयद अली शाह जिलानी और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के चेयरमैन यासीन मलिक पाकिस्तानी हुकूमत से बेहद नाराज हैं। कश्मीर मसले पर पाकिस्तानी हुक्मरानों की उदासीनता के मद्देनजर इन दोनों नेताओं की नाराजगी कश्मीरी और पाकिस्तानी अवाम, दोनों के लिए गंभीर चिंता की बात है। नवा-ए-वक्त को टेलीफोन पर दिए अपने इंटरव्यू में इन दोनों लीडरों ने बेहद हताश लहजे में कहा कि पाकिस्तान की हुकूमत की निगाह में कश्मीर अब दिलचस्पी का मसला नहीं रहा।

वास्तव में, वे आम कश्मीरियों के एहसास को ही अपनी आवाज दे रहे थे, जो यह मानने लगे हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है और उन्हें झटके खाने के लिए छोड़ दिया गया है। जिलानी की इस टिप्पणी में कुछ भी गलत नहीं है कि हमारे नेता भारतीयों के कायल हो गए हैं और वे उनकी लाइन के मुताबिक नीति अपना रहे हैं। 

इसीलिए वे भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार और अन्य क्षेत्रों में रिश्ते सुधारने की बात कर रहे हैं और कश्मीरी अवाम को अपने कूटनीतिक समर्थन की पारंपरिक नीति की उपेक्षा कर रहे हैं। भारत के संदर्भ में इस्लामाबाद जिस तरह से समर्पण वाला रुख इख्तियार कर रहा है, उससे भी यह आलोचना जायज लगती है, क्योंकि पाकिस्तान ने कश्मीर के मुख्य मुद्दे को तो नजरअंदाज किया ही है, उसने उन नदियों पर बांधों के निर्माण को भी अपनी इजाजत दे दी है, जिनसे सिंधु जल समझौते के तहत हमें पानी मिलता है।

यह किसी सदमे से कम नहीं है कि पानी एवं बिजली महकमे के काबीना मंत्री नावीद कमर ने नेशनल असेंबली में यह कहा कि हिन्दुस्तान केवल उन्हीं प्रोजेक्टों पर काम कर रहा है, जिन पर हमने उसे अपनी रजामंदी दी है। इससे भी बड़े सदमे की बात यह है कि ऐसी योजनाओं की तादाद 41 है। इसी लहजे में मंत्री ने यह भी कहा कि बगलिहार बांध के मामले में जो फैसला किया गया था, वह पाकिस्तान के हक में नहीं था। कश्मीर व जल बंटवारे के मामले में मौजूदा हुकूमत का रवैया जो भी हो, पर इन दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच कभी भी जंग छिड़ने की आशंका तब तक बनी रहेगी, जब तक कि वे विवादों को मुनासिब लेवल पर नहीं सुलझा लेते।  
द नेशन, पाकिस्तान

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