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ताले इधर भी लगने लगे हैं

इंटरनेट पर विचारों और सूचनाओं के मुक्त आदान-प्रदान से आम तौर पर चीन और ईरान जैसी सरकारों को समस्या रही है, लेकिन इधर भारत सरकार ने अपने सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत कुछ कड़े नियम जारी कर हलचल मचा दी है। इन नियमों में इस्तेमाल की गई शब्दावली कुछ ऐसी है कि जरूरत पड़ने पर कोई भी सरकार ऑनलाइन माध्यमों के विरुद्घ कार्रवाई करने के लिए उनकी अलग-अलग ढंग से व्याख्या कर सकती है।

आपत्तिजनक सामग्री की सरकारी सूची काफी लंबी, ढीली-ढाली और व्यापक है। जिस सामग्री पर सरकार को आपत्ति है, वह ईशनिंदात्मक, घृणास्पद, संकीर्णतापूर्ण, परेशान करने वाली और अन्य देशों के लिए अपमानजनक सामग्री हो सकती है। साथ ही ऐसी सामग्री जो राष्ट्रीय एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाए, मित्र देशों से हमारे संबंधों को प्रभावित करे या फिर कानून-व्यवस्था को हानि पहुंचाने की आशंका पैदा करती हो।

साइबर कानून विशेषज्ञों को लगता है कि सरकार द्वारा तय किए गए मानदंड इतने व्यापक और शब्दावली इतनी ढीली-ढाली है कि उसके दायरे में तो ज्यादातर ऑनलाइन सामग्री आ जाएगी। ऐसी सामग्री के लिए भी इंटरनेट माध्यमों को दंडित किया जा सकता है, जो किसी अन्य देश के लिए अपमानजनक हो। ऐसे प्रावधानों को पूरी तरह स्पष्ट बनाए बिना लागू करना उनके दुरुपयोग का पिटारा खोल सकता है।

आपको याद होगा छह साल पहले बाजी.कॉम (अब ईबे.को.इन) के सीईओ अवनीश बजाज को सिर्फ इस बात के लिए जेल जाना पड़ा था कि किसी यूजर ने उनकी वेबसाइट पर बिक्री के लिए अश्लील सीडी डाल दी थी। ऑनलाइन विश्व में खूब हो-हल्ला मचा था कि जो वेबसाइटें लाखों यूजर्स द्वारा इस्तेमाल की जाती हैं, उन पर किसी यूजर द्वारा डाली गई सामग्री के लिए वेबसाइट का मुखिया कैसे जेल भेजा जा सकता है? लेकिन कानून तो कानून है और खासकर उन्हें लागू करने वाले अगर इंटरनेट के तौर-तरीकों और प्रकृति से नावाकिफ हों तो फिर कुछ भी संभव है।

नए नियमों से भी कुछ-कुछ उसी किस्म का डर व्याप रहा है, जिनमें यह व्यवस्था है कि अगर किसी वेबसाइट पर ‘आपत्तिजनक’ सामग्री मौजूद है तो वेबसाइट संचालक को सूचना मिलने के 36 घंटे के भीतर संबंधित यूजर से संपर्क कर उसे हटवाना होगा या फिर उसे खुद हटाना होगा। ऐसा न करने पर दंडात्मक प्रावधान लागू होंगे। हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा, शांति और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने की बुनियादी जिम्मेदारी के मामले में इंटरनेट भी कोई अपवाद नहीं हो सकता, लेकिन क्या ऐसे मामलों के लिए हमारे पारंपरिक कानून पर्याप्त नहीं हैं?

सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित अपराधों से निपटने के लिए सन् 2000 में हम पहले ही अपना आईटी कानून ला चुके हैं और उसके बाद सन 2008 में उसमें संशोधन किए जा चुके हैं। इन संशोधनों में यूजर्स की हरकतों के लिए वेबसाइटों पर आने वाली जिम्मेदारी काफी हद तक हटा ली गई थी। हालांकि उसके बाद भी इन कानूनों की सीमाएं बरकरार हैं, लेकिन इस मायने में नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार पर ही अंकुश लगा दिया जाए।

नए आईटी नियमों के तहत इस्तेमाल किए गए ‘मानहानिकारक, अश्लील, घृणास्पद, संकीर्णतापूर्ण, परेशान करने वाले और विदेशों के लिए अपमानजनक’ जैसे मापदंडों का क्या मतलब है? घृणास्पद कितना, किस मायने में, किसके लिए, किस किस्म की आदि ढेरों पहलू हैं, जिन्हें पूरी तरह साफ किए जाने की जरूरत है।

अगर भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रही मौजूदा मुहिम के समर्थन में किसी वेबसाइट पर कोई आक्रामक लेख लिखा जाता है तो वह इनमें से अनेक श्रेणियों के तहत दंड का पात्र हो जाएगा। जाहिर है, इसकी व्याख्या आसानी से नकारात्मक रूप में की जा सकती है। इसी तरह, अश्लीलता के क्या मायने हैं? हो सकता है किसी एक संस्कृति में रहने वाले व्यक्ति के लिए जो अश्लील हो, वह दूसरों के लिए न हो। बात फिर इंटरप्रिटेशन पर आ टिकती है।

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