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बैकग्राउंडर: भारत विरोध ही जिसका आधार है

वह कौन सी बात है जो हमारे पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान को चैन से बैठने नहीं देती और वह अपनी बर्बादी की कीमत पर भी भारत को मिटा देना चाहता है? प्रख्यात विचारक एरिक हॉब्सबाय कहते हैं कि प्रत्येक राष्ट्र वास्तव में एक परंपरा की खोज होता है। यही परंपरा उसके अस्तित्व का स्वरूप निर्धारित करती है। भला एक राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान ने किस परंपरा की खोज की थी? मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा है उसका जवाब इसी सवाल में छुपा है। कोई भी राष्ट्र तीन तत्वों से मिलकर बनता है- लोगों की राष्ट्र बनने की इच्छा, सांस्कृतिक परंपरा और विचारधारा। पाकिस्तान का निर्माण लोगों की सामान्य इच्छा का परिणाम नहीं था। यह तो अंग्रेजों की नीतियों और एक राजनीतिक पार्टी की खीझ से पैदा हुआ था। आजादी की लड़ाई को कमजोर करने के लिए हिन्दू-मुसलमानों को आपस में लड़ाने की राजनीति की गई थी। यह धारणा स्थापित की गई थी कि कांग्रेस हिन्दुओं की पार्टी है और मुसलमानों के हितों से उसका कोई लेना-देना नहीं। 106 में मुसलमानों के भले के नाम पर मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। तब गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के नए हथियारों के सामने जो नेता पुराने-से पड़ गए थे, जिन्ना उनमें एक थे। वे अपनी राजनीतिक अतिमहत्वाकांक्षा को काबू नहीं कर पाए। इसीलिए उन्होंने कांग्रेस और गांधी विरोधी सांप्रदायिक राजनीति का पल्ला थामा। लेकिन मुसलमानों ने मुस्लिम लीग को अपना प्रतिनिधि स्वीकार नहीं किया। 1े आम चुनावों में लीग को मुस्लिम वोट का सिर्फ 4.8 प्रतिशत ही प्राप्त हुआ। इस हार से खीझे जिन्ना और लीग आक्रामक हो गए। 10 में पाकिस्तान की मांग को लक्ष्य घोषित कर दिया गया। ‘इस्लाम खतर में है’ और ‘मुल्क में हिन्दू राज कायम हो जाएगा’ के नार लगने लगे। 1में लीग हिंसक हो गई। दूसरी ओर हिन्दू सांप्रदायिक तत्वों ने मोर्चा संभाल लिया। दंगों और धर्मोन्माद का ऐसा हिस्टीरिया पैदा किया गया कि कांग्रेस ने विभाजन स्वीकार कर लिया, पाकिस्तान का जन्म हुआ। पाकिस्तान ने भारतीय संस्कृति के अथाह सागर से धार्मिक कट्टरता, टकराव और घृणा को चुना था। जिन्ना ने प्रेम और भाईचार से बनी गंगा-ामुनी तहाीब को इतिहास का झूठ बताकर औरंगजेब, फिरो तुगलक, तैमूर और नादिरशाह को महिमामण्डित किया। अकबर, अमीर खुसरो, अब्दुर्रहीम खानखाना, कुतुबन, मंझन, जायसी जसे सूफी-संतों को इतिहास से खारिा कर दिया गया। इतिहास के जो पात्र जन्मना मुसलमान नहीं थे, उनका जिक्र काफिरों की तरह हुआ या फिर नहीं हुआ। मौलाना आजाद, डॉ. जाकिर हुसैन, खान अब्दुल गफ्फार खान जसे कांग्रेसी नेताओं को गद्दार कहकर गालियां दी गईं। पाकिस्तान के विचार ने खुद को उदारता, धार्मिक सहिष्णुता और प्रेम की एक भरी-पूरी परंपरा से काट लिया। विचारधारा के नाम पर लीग के पास सांप्रदायिकता और अवैज्ञानिक सोच के अलावा कुछ नहीं था। कांग्रेस का अंध-विरोध उसका राजनीतिक मूलमंत्र था। लीग के पास मुसलमानों की गरीबी और असमानता को मिटाने के लिए कोई सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम नहीं था। इसीलिए पाकिस्तान बनने के बाद वहां सत्ता लोलुपता ही दिखाई दी। जिन्ना ने जब पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया तो यह हास्यास्पद मूर्खता भर सिद्ध हुआ। क्योंकि जिन्न बोतल से बाहर आ चुका था। इस तरह पाकिस्तानी राष्ट्र के तीन आधारभूत तत्व बन गए- गैर-ािम्मेदारी भरी राजनीति, धार्मिक कट्टरता का सामाजिक परिवेश और भारत के अंध-विरोध की राष्ट्रवादी चेतना। इस नाते पाकिस्तान राष्ट्र नहीं भारत का प्रति-राष्ट्र बन जाता है। उसे अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए भारतीय राष्ट्र की संकल्पना से टकराना ही है। इसी टकराहट में, पिछले साठ साल से यह प्रति-राष्ट्र धीर-धीर मिटता जा रहा है। 1में बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी ने भारत को अपना देश मानकर उसे पहली चुनौती दी थी। दूसरी चुनौती 1में कश्मीरी लोगों की तरफ से आई। 1में पाकिस्तान खुद टूट गया और बांग्लादेश का जन्म हुआ। और अब- सिंध, बलूचिस्तान और वजीरिस्तान धर्म आधारित एकता को धता बताकर अलगाव और विघटन का खतरा पैदा कर रहे हैं। पाकिस्तानी अवाम गरीबी, अशिक्षा और कट्टरपंथ की जहालत झेल रही है। अर्थव्यवस्था अनुदानों की मोहताज है। एक विकृत और अस्थिर लोकतंत्र है। सत्ता प्रतिष्ठान पर सेना बुरी तरह हावी है। पश्चिमोत्तर सीमाओं पर तालिबान का कब्जा है। इस टकराव और टूटन के क्षण में भी पाकिस्तान के पास देश को जोड़े-बटोर रखने का एकमात्र तरीका है- भारत के खिलाफ आतंकी जेहाद और युद्ध का उन्माद फैलाना। पाकिस्तान के भले के लिए पाकिस्तानी लोगों को पाकिस्तानी राष्ट्र की इच्छा, संस्कृति और विचारधारा से जूझना होगा। वरना किसी युद्ध की जरूरत नहीं है। पाकिस्तानी प्रति-राष्ट्र तो अपने आप ही तबाह हो रहा है। लेखक इतिहास में शोध कर रहे हैं।

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