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जनादेश के बूते

बांग्लादेश के चुनाव में अपनी भारी विजय के बाद अवामी लीग की नेता शेख हसीना ने आतंकवाद विरोधी स्पष्ट वक्तव्य दिया है,यह बात भारत के लिए आशाजनक है। पिछले दिनों भारत में हुई आतंकवादी वारदातों में बांग्लादेशी तत्वों खासकर हूाी का नाम हमेशा आया है। अगर शेख हसीना अपने वक्तव्य को अमल में लाती हैं तो भारतीय उपमहाद्वीप से आतंकवाद खत्म करने की दृष्टि से यह बड॥ा कदम होगा। कई बातें इस वक्त शेख हसीना के पक्ष में हैं। एक तो इन चुनावों में लगभग 81 प्रतिशत मतदान हुआ है और ये चुनाव निष्पक्ष हुए हैं इसलिए विश्व समुदाय के सामने इनकी वैधता है। दूसरी बात यह है कि शेख हसीना का मुख्य चुनावी मुद्दा आर्थिक विकास था और उनके गठबंधन को खालिदा जिया के गठबंधन से लगभग दुगने मत प्राप्त हुए, इसका अर्थ यह है कि बांग्लादेश का बहुत बड़ा जनमत उनके साथ है। बांग्लादेश में यह इतिहास रहा है कि जो भी पार्टी या गठबंधन चुनाव हारता है वह संसद में विपक्ष की भूमिका निभाने की बजाय सड़कों पर उतर आता है और बंद और हड़तालों से राजकाज असंभव बना देता है। खालिदा जिया ने भी इस बार हार के बाद ऐसे ही संकेत दिए हैं लेकिन संभवत: इस बार देश में उन्हें ज्यादा समर्थन नही मिलेगा। यह भी साफ है कि आतंकवाद के मसले पर बांग्लादेश की आम जनता क्या सोचती है, और शेख हसीना ने इसी रवैये का क्षहार किया है। लेकिन कट्टरवाद और आतंकवाद से लड़ना इतना आसान भी नहीं है। कट्टरपंथी भले ही संख्या बल में कम हों लेकिन मुखर हैं। हिंसा और धनबल का सहारा उनके पास है। इस उपमहाद्वीप में आतंकवाद फैलाने के लिए जिम्मेदार आईएसआई भी आसानी से बांग्लादेश में अपने मोर्चे छोड़ेगी नहीं और वह शेख हसीना के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। लेकिन शेख हसीना की असली ताकत उन्हें मिला भारी जनादेश है। उनके गठबंधन को पिछले चुनावों से लगभग नौ प्रतिशत वोट ज्यादा मिले हैं जिसका एक अर्थ यह है कि नौजवानों ने उन्हें भारी संख्या में वोट दिए हैं। जाहिर है इन युवाओं की दिलचसपी कोई काल्पनिक धर्मयुद्ध लड़ने में नहीं, आर्थिक विकास और स्थायित्व में है। अगर शेख हसीना सचमुच बांग्लादेश की राजनीति का रुझान विकास और आर्थिक संपन्नता की ओर मोड़ पाती हैं, तो यही आतंकवाद के खिलाफ एक बड़ा कदम होगा।

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