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पूवरेत्तर के प्रश्न

गुवाहटी में बृहस्पतिवार को जो धमाके हुए वे अपने पीछे कई पहेलियां छोड़ गए हैं। एक तो यह कि इस विस्फोट का मकसद क्या था? क्या ये विस्फोट सिर्फ इसलिए किए गए कि नए साल के मौके पर किए गए इस तरह के कारनामे की गूंज कुछ ज्यादा ही दूर तक सुनाई देती है? या इसलिए कि गृहमंत्री पी. चिदंबरम का यह पहला असम दौरा था? उसके पहले शिवराज पाटिल ने अपने पूरे कार्यकाल में वहां जाने की जरूरत ही नहीं समझी थी। या फिर बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार बन जाने के बाद आतंकवादी यह बताना चाहते हैं कि अगर वहां से उन्हें सहयोग न मिले तो भी वे आतंक के नमूने पेश करने में खासे समर्थ हैं? पहेली यह भी है कि यह विस्फोट किया किसने? आतंकी संगठन अल्फा ने या बोडो आतंकवादियों ने? अगर हम अल्फा को ही लें तो इसमें कई विभाजन हो गए हैं और कुछ गुट तो सरकार से वार्ता चलाने की भी तैयारी कर रहे हैं। तो फिर यह काम किस गुट का है? यही स्थिति बोडो आतंकवादियों की भी है। अनुमान है कि अकेले असम में ही एक दर्जन आतंकी गुट सक्रिय हैं। पूर पूवरेत्तर भारत को लें तो संख्या शायद दो दर्जन से भी ऊपर चली जाए। इन पहेलियों का जिक्र यह समझने भर के लिए जरूरी है कि समस्या कितनी जटिल हो चुकी है। और दिल्ली में बैठे हमार नीतिनियामक न इस जटिलता को लेकर संवेदनशील हैं और न ही पूवरेत्तर के महत्व को लेकर। देश के इस कोने में हुई आतंकवादी वारदात को अक्सर उतना महत्व नहीं मिलता जितना किसी महानगर या उत्तर भारत में हुई वारदातों को। कश्मीर की समस्या को लेकर हम जिस स्तर पर और लगातार जितनी कोशिशें करते रहते हैं उस ऊरा और धन का शायद दसवां हिस्सा भी पूवरेत्तर की समस्याओं के समाधान पर खर्च नहीं हो रहा है। कहीं न कहीं हम उसे एक ऐसी समस्या मान चुके हैं जिसे सुरक्षा बलों के भरोसे विस्फोटक होने से रोका जा सकता है। ऐसा करने में हमने कुछ हद तक सफलता भी हासिल की है। लेकिन देश के इस हिस्से को लोकतंत्र और विकास की राजनीति से जीतना ज्यादा जरूरी है। आतंकवादी और पृथकतावादी गुट अलग -थलग पड़ जाएं इसके लिए यह ज्यादा जरूरी है कि इस क्षेत्र के युवकों को देश के विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। इन छोटे-छोटे उग्रवादी गुटों की बड़ी समस्या से निबटने के लिए एक वृहद समाधान की जरूरत है।

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  • Web Title: पूवरेत्तर के प्रश्न