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बुरा मानो या भला : अब भी परेशान करती है मुंबई

उसे हुए एक महीने से ज्यादा हो गया। हैरानी और गुस्सा अब काफी शांत हो गया है। लेकिन उसका दर्द अब भी है। जसाकि दांत के दर्द में होता है। आपकी जीभ घूम-फिर कर उसी दांत पर चली जाती है। उसके साथ ही दर्द फिर हरा हो जाता है। मैं 26 नवंबर को जो हुआ उसके बार में सोचता हूं और दर्द लौट आता है। तमाम आरोपों और पाकिस्तान की मनाही के बाद मैं कुछ जवाब नहीं तलाश पाता हूं। मसलन, आखिरकार साजिश रचने वाले कौन थे? उन्होंने ऐसा क्यों किया? कौन उन्हें ऐसे जुर्म करने को मजबूर करता है? क्या उन्हें मालूम है कि इससे हिंदुस्तान-पाकिस्तान में जंग हो जाएगी? एक ऐसी जंग जिसमें किसी की जीत नहीं होनी है। बस हार ही हार होगी। इस बीच मार गए नौ आंतकियों की लाशें सड़ती रहेंगी। हिंदुस्तानी मुसलमान उन्हें सुपुर्द-ए-खाक नहीं करंगे क्योंकि उनके हमले में मरने वाले 40 मुसलमान थे। पाकिस्तान इसलिए नहीं करगा, क्योंकि वह उन्हें अपना मानने को तैयार ही नहीं है। एक आतंकी कसाब को पकड़ लिया गया है। वह बहुत कुछ बता रहा है। वह बता चुका है कि किस गांव का है। उसके पिता कौन हैं? साथ ही यह भी कि वह खुद इस काम के लिए तैयार हुआ था। घर वालों का उसमें कोई कसूर नहीं है। दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन से उसे वकील नहीं मिल सकता क्योंकि वे उसे अपना कैसे मान लें? तो वहां से चुप्पी मिलती है। हमें पाकिस्तानी लीडरान से किसी ईमानदार कोशिश की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। वैसे भी उनकी चलती ही अपने आधे देश में है। उत्तर-पश्चिम का हिस्सा तो वैसे भी पिछड़े हुए मुल्ला जिहादियों के कब्जे में है। अमेरिका के कहने पर पाकिस्तानी आर्मी उन पर कार्रवाई तो करती है, लेकिन वह आधे-अधूर मन से होती है। आखिरकार वे उनके ही देशवासी और मुसलमान हैं। अमेरिकी और हिंदुस्तानियों से लड़ना उनके लिए आसान है क्योंकि दोनों मुसलमान नहंीं हैं। कोई नहीं जानता कि उनकी आईएसआई का क्या रोल है? माना जाता है कि वह जिहादियों को शह देती है। हम यह भी नहीं जानते कि पाकिस्तान का एटमी भंडार किसके कब्जे में है? कौन उसका बटन दबा सकता है? कुल मिलाकर सब कुछ समझ से पर है। अगर मुंबई जसा फिर कुछ हो जाता है, तो हालात पर काबू पाना मुश्किल होगा। ािला खानड्ढr उस्ताद विलायत खान की बेटी हैंोिला खान। विलायत खान साहब एक वक्त में हिंदुस्तान के सबसे मशहूर सितार वादक थे। अब अपने पिता, दादा उस्ताद इनायत खान और परदादा इमदाद खान की तरह वह भी मशहूर हैं। वह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की मशहूर गायिका हैं। सूफियाना कलाम की माहिर हैं। उर्दू-हिंदी गजल को बेहतरीन ढंग से गाती हैं। बचपन से ही उन्हें आठ घंटे रियाा की आदत है। संगीत को पूरा वक्त देने के लिए ही उन्हें दसवीं के बाद पढ़ने नहीं दिया गया। वह अपनी सात पीढ़ियों में पहली महिला हैं, जो शास्त्रीय गायन करती हैं। उन्होंने मेरी महफिल में गा कर इज्जत बख्शी। वह सचमुच यादगार शाम थी। लेकिन मेर लिए हैरान करने वाली कई चीजें थीं। मैं सोच रहा था कि वह अकेली आएंगी। पर वह हारमोनियम और तबला वादक के साथ आईं। एक फोटोग्राफर भी उनके साथ था। मैं उन्हें पुराने खयालात की छुईमुई किस्म की समझता था। लेकिन उन्होंने मुझे ‘किस’ किया। मैंने उन्हें शराब पेश की। उन्होंने मनाही कर दी। उसकी जगह चाय मांगी। चाय पीते हुए मोबाइल उनके साथ ही था। मुझे तो महफिलों में मोबाइल से बड़ी चिढ़ होती है। शुरुआत हारमोनियम और तबला की लय देखने से हुई। वह बीच-बीच में अच्छी-खासी अंग्रेजी और उर्दू में मेर जवाब देती रहीं। इसी बीच उनका मोबाइल बज उठा। न्यूयॉर्क से कोई तारीखें तय कर रहा था। वह गाने लगीं। तभी फिर मोबाइल बजा। इस बार कोची से था। उन्होंने तारीख बदलने को कह दिया। मुझे लगा कि वह छह भुजाओं वाली कोई देवी है, जो इतने काम एकसाथ किए जा रही है। मैं तब तक उखड़ चुका था। मैनें कहा, ‘इस कम्बख्त मोबाइल को बंद कर दीजिए।’ उन्होंने बुरा नहीं माना। बंद कर बैग में रख लिया। उसके बाद उन्होंने शुरू करने की क्षाजत मांगी। मैंने सिर हिलाया। ‘आप क्या सुनना चाहेंगे?’ मैं उसके लिए तैयार नहीं था। उन्होंने गाना शुरू किया, ‘मुद्दत हुई है यार को मेहमां किए हुए।’ मैं उसमें बहा जा रहा था। वह गालिब से हफीा जलंधरी तक गाए चली जा रही थीं। मैं तो किसी और दुनिया में था। महफिल में शामिल बाकी लोग भी। जब मैं रात में सोया तो उनकी खूबसूरत आवाज गूंजती रही।

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