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स्कूली दौर से था माही में मिडास टच

स्कूली दौर से था माही में मिडास टच

महेंद्र सिंह धोनी को क्रिकेट का ककहरा सिखाने वाले उनके पहले कोच केशव रंजन बनर्जी का कहना है कि माही के जिस मिडास टच की बात आजकल की जाती है, वह दरअसल उसमें स्कूली दौर से था और उसने लगातार चार साल टीम को चैम्पियन बनाया। धोनी की कप्तानी में भारतीय टीम ने टी20 विश्वकप और एक दिवसीय क्रिकेट का विश्वकप जीता। इसके अलावा टीम टेस्ट रैंकिंग में नंबर वन तक पहुंची। धोनी ने इंडियन प्रीमियर लीग में चेन्नई सुपर किंग्स को चैम्पियन बनाया और उनकी टीम चैम्पियंस लीग भी जीती। रांची के जवाहर विदया मंदिर के खेल प्रशिक्षक बनर्जी ने बातचीत में कहा कि माही में मिडास टच बचपन से था। नौवीं से 12वीं तक उसने अपने जबर्दस्त खेल की बदौलत टीम को इंटर स्कूल चैम्पियन बनाया। बारहवीं में वह टीम का कप्तान भी था और तभी मैं समझ गया था कि एक दिन यह भारतीय टीम की कप्तानी करेगा। धोनी को फुटबॉल से क्रिकेट खेलने के लिए प्रेरित करने वाले इस अनुभवी कोच ने कहा कि माही का आत्मविश्वास उन्हें हमेशा हैरान कर देता था। उन्होंने कहा कि 2000-01 में उसे भारत की अंडर 19 ए टीम में चुना गया। टीम में दो विकेटकीपर थे माही और अजय रात्रा। उस समय उसकी कलाई में फ्रेक्चर हो गया और उसे पीलिया भी हो गया था लिहाजा उसने खेलने से इनकार कर दिया। बनर्जी ने कहा कि मैंने उससे कहा कि ऐसे मौके बार बार नहीं मिलते तो उसका जवाब था कि मैं अगले तीन साल में भारतीय टीम के लिए खेलूंगा और ऐसा ही हुआ। वह इरादों का पक्का था और आज भी है। धोनी को कैप्टन कूल की संज्ञा बरसों पहले बनर्जी ने भी दी थी। उन्होंने कहा कि बड़े मैचों में भी वह घबराता नहीं था। कभी हम हार जाते तो वह दिलासा देता कि कोई बात नहीं, अगला मैच जीतेंगे। उसकी तैयारी और विरोधी टीमों को लेकर विश्लेषण इतना पुख्ता होता था कि सभी खिलाड़ियों में हौसला भर जाता था। धोनी की उपलब्धियों को महज तकदीर मानने से इनकार करते हुए बनर्जी ने कहा कि इसके पीछे उसकी बरसों की कड़ी मेहनत है। उन्होंने कहा कि जब वह छठी क्लास में था तब फुटबॉल खेला करता था। मुझे स्कूल की क्रिकेट टीम के लिए विकेटकीपर की तलाश थी तो मैंने उसकी गोलकीपिंग देखकर उसके सामने प्रस्ताव रखा। उसने स्कूली टीम में शामिल होने भर के लिए डेढ साल मेहनत की। उन्होंने कहा कि क्लास के बाद सभी अभ्यास करते थे और वह कई घंटों मेहनत करता था। उसके परिवार की हिदायत थी कि पहले पढ़ाई फिर खेल और वह कभी किसी क्लास में फेल नहीं हुआ।

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