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कोसी की बाढ़ ने बना दिया शरणार्थी

ोसी की प्रलयंकारी बाढ़ इस साल बिहार के लिए सबसे बड़ी त्रासदी बनकर आयी। पांच जिलों में कहर बनकर टूटी बाढ़ ने लाखों लोगों को अपने ही प्रदेश में शरणार्थी बना दिया। घर-बार विलीन हो गए और 30 लाख से अधिक की आबादी सरकारी तंत्र की मोहताज बन गयी। उफनती धाराएं इस कदर कहर बरपाएंगी इसका अंदाजा न तो राज्य सरकार को था और न ही केन्द्र सरकार को। सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया और अररिया में शायद ही इसके पहले कभी इतनी बड़ी त्रासदी आयी थी। खेत-खलिहान, सड़क, पुल-पुलिया और तमाम बुनियादी ढांचे तहस-नहस हो गए।ड्ढr बाढ़ की विभीषिका का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता था कि प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह के हवाई सव्रेक्षण के बाद इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया गया और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लाखों जनता से बार-बार यह अपील करनी पड़ी कि वे अपने गांव-घर को छोड़कर कर बाहर आ जाएं। पूर देश की निगाह बिहार पर थी। हहऽ-हहऽ कर बह रही नदी की धार के बीच फंसे सैकड़ों गांवों के लोगों को बाहर निकालना और वहां तक राहत पहुंचाना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। मामला हाथ से निकलता देख सरकार ने सेना और नौसेना को बुलाने का फैसला किया। इसके अलावा नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स की भी मदद ली गयी। करीब 2 हजार से अधिक नावें और 6 सौ से अधिक मोटर बोट की मदद से लगभग दस लाख लोगों को बचाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। बावजूद इसके सैकड़ों लोगों और पशुओं की जानें गयीं। आपदा राज्य मंत्री नीतीश मिश्र के अनुसार कोसी की बाढ़ में 524 लोगों और तीन हजार से अधिक पशुओं की जानें गयी हैं। यह आंकड़ा बढ़ भी सकता है। वायु सेना के 11 हेलीकॉप्टर से एक लाख से अधिक फूड पैकेट की ड्रापिंग की गयी। करीब एक लाख पॉलीथिन शीट्स बांटे गए। बाहर निकाले गए लोगों को आश्रय देना बड़ी चुनौती थी। सरकार ने इसके लिए रणनीति बनायी और बाढ़ प्रभावित जिलों में करीब 300 राहत शिविर और लगभग दो दर्जन मेगा कैम्प बनाए गए। अलग-अलग विभागों के अधिकारियों की टीम बनाकर कैम्पों में 3 हजार से अधिक अस्थायी शौचालय, 2 हजार से अधिक चापाकल गाड़े गए। मेडिकल कैम्प और पशु चिकित्सा शिविर भी लगाए गए। राहत शिविरों में करीब चार लाख लोगों को आश्रय दिया गया। खासबात यह रही कि शिविरों में कई गर्भवती महिलाएं मां भी बनीं और 6-14 साल के बच्चों के लिए स्कूल भी शुरू की गयी। महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई की ट्रनिंग भी दी गयी। बाढ़पीड़ितों की मदद में न सिर्फ सरकार आगे आयी बल्कि स्वयं सेवी संस्थाओं ने भी जबरदस्त भूमिका निभाई। देश भर से लोगों ने राहत कोष में करोड़ों रुपए दिए। पानी कम हुआ तो सरकार की ओर से पीड़ित परिवारों को एक-एक क्िवंटल अनाज के अलावा बर्तन और कपड़ों के लिए एक-एक हजार रुपए बांटने की प्रक्रिया शुरू हुई। कैम्पों में मुख्यमंत्री राहत कोष से एक लाख से अधिक फैमिली किट्स भी बांटे गए। वहां के हालात अब सामान्य हो रहे हैं। राहत कैम्प लगभग बंद हो चुके हैं। लोग अपने गांव-घर की ओर लौट चुके हैं। अब उन्हें जरूरत है बुनियादी सुविधाओं की जिसे पटरी पर आने में शायद अभी काफी वक्त लगेगा।

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