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अच्छी खबर के सच

खबरांे का कारोबार कभी मन्दा नहीं होता। बल्कि मन्दी और दरिन्दगी की घटनाआें के बीच तो यह कारोबार खूब फलता-फूलता है। समाज की बदकिस्मती खबरनवीसों की किस्मत बनती है। पाठकों के दिल में जितनी टीस पैदा कर पाएंे, या उन्हें आह-आह करने पर मजबूर कर पाएं, खबरें उतनी ही बड़ी मानी जाती हैं। लकिन मुख्यधारा क अखबारां मं वाह खबरां का काराबार भी समाज मं प्ररणा और उम्मीद की अलख जगान मं असरदार हा सकता है। मुहिम चलाने वाले सम्पादकां-पत्रकारां की नार मं समाज का एक तबका हाशिए पर धकला जा रहा है। उसकी उपलब्धियां, चुनौतियां, हौसल, यागदान मीडिया क लिए काई मायन नहीं रखत। दश मं हा रही हिंसक घटनाआं क बाद बहतरी का माहौल बनान क लिए पत्रकारिता अगर कुछ कर सकती है ता यही कि आम लागां का, आम जिन्दगी स जुड़ मुद्दां का और तकलीफां का भी जगह द। नक कामां का भी लीड और एंकर बनाए जान पर नए सिरे स विचार करे। खबर का वजन सकारात्मकता क बाटां स भी तौला जाए। अखबारां क एंकर मं साफ्ट स्टारी दन की परम्परा और युवा परिशिष्टां क चरित्र मं यह आशय गुंथा हुआ है, लकिन मनस्ट्रीम की स्पाट स्टारीज मं भी सकारात्मकता पिराई जा सकती है। कभी-कभार खबरचियां क सामन खबरें खुद ब खुद एस आ खड़ी हाती हैं, माना चुनौती द रही हां कि बताआ अब कैस दरकिनार कराग। एक वाकया राजस्थान की राजधानी मं हुआ। राड रैश का मामला था। शहर मं घूमन आईं तीन बच्चियां का रात का नश मं धुत्त एक रसूखदार न रौंद दिया। एक बच्ची की मौत हा गई। परिवार की इकलौती संतान इस बच्ची क साथ हुए दर्दनाक हादस का पढ़कर दिल जार-जार हा गया। एक शख्स की सूझबूझ और हिम्मत क चलत रसूखदार पकड़ मं आया। अभिमन्यु नाम क इस समझदार नौजवान न दर रात हुए इस हादस क वक्त सच्च नागरिक और अच्छ इन्सान की जिम्मदारी निभाई। महज औपचारिकता क लिए नहीं, बल्कि पूरी शिद्दत स सौ फीसदी मदद की। अखबारां न उसक जज्ब का सराहा। घटना क चश्मदीद अभिमन्यु न न कवल कार स बच्चियां का कुचलकर भाग रह अभियुक्त का गाड़ी स पीछा किया, बल्कि इसी बीच पुलिस का सूचित भी किया, अभियुक्त की कार क सामन अपनी कार अड़ाकर उस राकन की काशिश की, अभियुक्त उसकी गाड़ी का टर मारकर भागा ता उसका पीछा करत हुए उसकफार्म हाउस तक पहुंच कर ही दम लिया। इसक बाद अभियुक्त स सामना हान पर न उसकी धौंस स डरा, न धमकी स, न उसकी पशकश क सामन अपना ईमान खाया। अखबारां न भी खबर क साथ न्याय किया। कहीं पहल पन्न पर ता कहीं सिटी पृष्ठां पर, कहीं थाड़ी ता कहीं ज्यादा लकिन उसक जज्ब का पूरी जगह मिली। साठवं दशक क उत्तरार्ध मं हुए अमेरिकी चुनावां क अध्ययन क आधार पर मैकाम्ब और शॉ न मीडिया की खबरां क असर क बार मं एजंडा सैटिंग का सिद्धान्त दिया था। यानी मीडिया जिन मुद्दां का पश करता है समाज मं उन्हीं घटनाआं की चर्चा हाती है और मीडिया क गटकीपर्स यानी खबरां क निर्णयकर्ता यह तय करत हैं कि किन खबरां का अखबार की स्पस नसीब हा। राड रैश की घटना मं रसूखदार क शामिल हान की वजह स यह घटना मीडिया एजंडा मं शामिल हाकर जनचर्चा का मुद्दा भी बनी। हालांकि अभिजात्य वर्ग की छाया हान स यह घटना चक्रव्यूह सरीखी हा गई, जिस ताड़न की पहल एक अभिमन्यु न ही की। अभियुक्त और पुलिस महकम क रवैय पर पाठक थू-थू कर रहा है और अभिमन्यु क विवक का सराह रहा है। अगर शहर मं मौजूद राष्ट्रीय मीडिया क नुमाइन्दां न भी उस बतौर हीरा या विशलब्लाअर क तौर पर भी पश किया हाता ता नौजवान का हौसला और राड रैश का राग दशभर मं बहस का विषय हा सकता था। कमी इतनी सी थी कि यह घटना मट्रा शहर मं नहीं घटी। राष्ट्रीय चरित्र अख्तियार करन क लिए खबरां का मट्रा शहरां तक का सफर तय करन की और सनसनीखज हान की अनिवार्यता है। नकारात्मकता मं घुट रह दश का इस वक्त घृणा, हिंसा और आक्राश स भरपूर चटपटी खबरां की बजाय सकारात्मक कवरेज की दरकार है। पत्रकारिता क सवा दा सौ साल बाद भी हम प्ररक घटनाआं का साफ्ट स्टारीज की तरह ट्रीट कर उस मुख्य खबरां क स्टार दर्ज स अलग-थलग कर दत हैं। हमारे लिए द्वन्द्व, घाटाल, सत्ता संघर्ष, कत्ल, लूट, आगजनी, आत्महत्या की वदना स भरी या घिनौनी घटनाएं ही मुख्य खबर बनन की पात्रता रखती हैं। मीडिया क पहल पायदान पर ही समाज क हितां और पाठक रुचि का सर्वापरि रखन का पाठ पढ़ाया जाता है। पाठक भी बार-बार यह संप्रषित कर चुका है कि वह राजनीति व अपराध की आवरडाज और खबरां क साथ हा रही राजनीति स आजिज आ चुका है। अब उस सच्ची खबर चाहिए जा उस घृणा क लिए उकसान की बजाय किसी का सम्मान दन और सलाम करन क लिए प्ररित करे। आदशार्ं की पुनस्र्थापना मं मीडिया क गटकीपर्स का यही यागदान हा सकता है।

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