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सुसंगत इतिहास-बोध के धनी

जिन्होंने मेर उपन्यास ‘झांसी की रानी’, ‘जली थी अग्निशिखा’, ‘नटी’ और ‘अमृत संचय’ पढ़े हैं, वे बुंदेलों की धरती के प्रति मेरी प्रीति से परिचित होंगे। उसी भूमि पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृति ‘बुंदेलखंड का स्वाधीनता आंदोलन और पत्र-पत्रिकाएं’ शीर्षक से अभी-अभी आई है। लेखक हैं- संतोष भदौरिया। यह कृति एक शोध प्रबंध है। मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग की फेलोशिप के तहत किए गए इस शोध में एक तरफ भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामयिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बुंदेलखंड की अलग और विशिष्ट पहचान का विवरण है तो दूसरी तरफ भारतीय स्वाधीनता संग्राम में बुंदेलखंड की पत्र-पत्रिकाओं के ऐतिहासिक योगदान को उसके इतिहास, विकास और संघर्ष-गाथा के साथ विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। यदि चारों परिशिष्टों को भी जोड़ लें तो यह पुस्तक नौ अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में संतोष ने पृष्ठभूमि के रूप में बुंदेलखंड के नामकरण, सीमांकन और स्वाधीनता संग्राम का संक्षिप्त किंतु दीप्त इतिहास दिया है। पत्रकारिता को जल्दबाजी में लिखा गया इतिहास माना जाता है पर उसमें भी कई बार अनेक तथ्य कालजयी दस्तावेज बन जाते हैं। पहले ही अध्याय में संतोष ने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास, उद्भव और विकास को समेट लिया है। संतोष भदौरिया ने एक अन्य अध्याय में 1857 से लेकर 1तक बुंदेलखंड से निकली पत्र-पत्रिकाओं का सव्रेक्षण और उन पत्रिकाओं के मार्फत स्वतंत्रता की अभिव्यक्ित का विवरण दिया है। उन पत्र-पत्रिकाओं के मुख्य विषयों- राजनीतिक प्रश्न, आर्थिक शोषण, सामाजिक सुधार बोध, सांस्कृतिक संकट पर विहंगम दृष्टि डालने के साथ ही उन पत्र-पत्रिकाओं के साहित्यिक अवदान का सम्यक मूल्यांकन भी प्रस्तुत किया गया है। संतोष भदौरिया की पैनी-खरी विश्लेषण दृष्टि मेरी राय में बेहद तात्पर्यपूर्ण है। उन्होंने उन कृती संपादकों-पत्रकारों की संघर्ष-गाथा का पूरा विवरण भी दिया है, जो रणबांकुर भी थे। इस संघर्ष-गाथा को ‘कलम आज उनकी जय बोल’ शीर्षक में दर्ज किया गया है। तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं के चुनिंदा लेख और संपादकीय मूल रूप में देने के अलावा बुंदेली लोकगीतों में स्वाधीनता संग्राम की अभिव्यक्ित को भी रखांकित किया गया है। मुझे लगता है कि इस किताब को यहीं पूर्णता मिलती है। खुद ‘झांसी की रानी’ जसी किताबें लिखते समय बुंदेली लोकगीत, लोककथाएं और लोगों से सुने गान मेर प्रेरणास्रेत रहे। मैं संतोष भदौरिया के प्रति इसलिए कृतज्ञ हूं कि उन्हें पढ़ते हुए मुझे ‘बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास’ (गोर लाल तिवारी) का स्मरण हो आया, जो मैंने आधी शताब्दी से भी पहले पढ़ी थी। गुनी थी। पेशे से प्राध्यापक संतोष ने ब्रिटिश काल के मीडिया पर बेहद महत्वपूर्ण अनुशीलन प्रस्तुत किया है। उनकी किताब ‘अंग्रेजी राज और प्रतिबंधित हिंदी पत्रिकाएं’ यही कोई आठ साल पहले आई थी। उसी की अगली कड़ी उनकी दूसरी पुस्तक ‘शब्द प्रतिबंध’ थी। उसे पढ़ते हुए आज के पाठक जान सकेंगे कि पराधीन भारत में किस तरह शब्दों पर पहर बिठाए जाते थे, किस तरह पत्र-पत्रिकाओं को प्रतिबंधित किया जाता था और प्रतिबंधों के बावजूद किस तरह तत्कालीन पत्रकारों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाया और स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी के लिए आम जनता को प्रेरित किया। संतोष ने उन अखबारों-पत्रिकाओं के तेवर, रुझान और प्रतिबद्धता का गंभीर अध्ययन किया है, जिन पर ब्रिटिश शासनकाल में प्रतिबंध लगा दिया गया था। क्या आज के नए पत्रकारों को पता है कि 107 में इलाहाबाद से निकले ‘स्वराज साप्ताहिक’ के आठ-आठ संपादकों को जेल हुई। एक संपादक जेल जाता तो दूसरा संपादक आता। अखबार में विज्ञापन निकलता- ‘चाहिए ‘स्वराज’ के लिए एक संपादक। वेतन- दो सूखी रोटियां, एक ग्लास ठंडा पानी और हर संपादकीय के साथ दस साल की जेल।’ इसी तरह के कई तथ्यों का पता संतोष भदौरिया की किताब से चलता है। प्रकारांतर से संतोष की किताब पराधीनता के उस काले दौर में हिंदी पत्रकारिता के संघर्ष का लेखा-ाोखा भी है तो वहीं देश की आजादी की लड़ाई में प्रतिबंधित पत्र-पत्रिकाओं के अवदान को भी सामने लाती है। इन कृतियों से आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता के योगदान का पता चलता है। वैश्वीकरण-उदारीकरण ने आज जब देश को आर्थिक पराधीनता की मुंडेर पर ला खड़ा किया है, ऐसे में स्वाधीनता संग्राम का स्मरण और उसकी प्रेरणाएं बड़े काम की हैं, इस दृष्टि से भी संतोष की किताबें बेहद महत्वपूर्ण हैं। संतोष पत्रकारिता के इतिहास के अनन्य अध्येता और विशेषज्ञ हैं। वे विचारों से पक्के वामपंथी, प्रगतिशील हैं। उनसे बातचीत करते हुए उनकी वाग्मिता से मैं बहुत प्रभावित हुई। उनके साहित्य में जो सुसंगत इतिहास बोध और इतिहास दृष्टि है, इसी कारण वे मूल्यवान इतिहास रच सके हैं और पाठकों को भी वे अतीत में उतरने का मौका देते हैं। पत्रकारिता के इतिहास के विद्यार्थियों को संतोष से यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि तरह-तरह की किंवदंतियों के घटाटोप को पार कर कैसे तथ्यों और प्रामाणिक सूचनाओं पर आधारित अनुशीलन किया जाता है।

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