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छंटने लगी चांद के चेहरे से धुंध

चंद्रमा पर अनेक भूरी-सफेद पहाड़ियां हैं। इनमें से चार चोटियां दो किलोमीटर तक ऊंची हैं। पहली बार भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को चांद की पहाड़ियों की सही सही ऊंचाई पता करने में कामयाबी मिली है। इसकी वजह है कि चंद्रयान-1 में अब तक के सबसे उन्नत टैराइन मैपिंग कैमरा मौजूद है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चैयरमैन जी. माधवन नायर ने यहां साइंस कांग्रेस में बताया कि टेराइन मैपिंग कैमरा के आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण हैं। विगत में अमेरिका, रूस, जापान और चीन के उपग्रह चांद पर जाते रहे हैं, लेकिन पहली बार चांद के पहाड़ों की ऊंचाई नापने में सफलता मिली है। उन्होंने कहा कि इनमें से चार चोटियां, जहां 2000 मीटर तक ऊंची हैं, वहीं ये चांद की सतह पर 500 मीटर तक फैली हुई हैं। चंद्रयान से मिली तस्वीरों एवं आंकड़ों से वहां कभी ज्वालामुखी होने, लौह तत्व की मौजदूगी की पुष्टि पहले ही हो चुकी है। चंद्रयान की यह तीसरी महत्वपूर्ण खोज है। नायर ने बताया कि चांद पर पानी या बर्फ होने की अभी पुष्टि नहीं हुई है। चांद की चोटियां सफेद क्यों है, इसका भी कोई कारण अभी तक पता नहीं चल पाया है। लेकिन यदि बर्फ और पानी है तो चंद्रयान से क्या उसका पता चल जाएगा? उन्होंने बताया कि चंद्रयान से मिले 30 हजार चित्रों का विश्लेषण किया जा रहा है और इस महीने के अंत तक हम और कई महत्वपूर्ण जानकारी देने में कामयाब होंगे। यह पूछे जाने पर कि मून मिशन आम आदमी के लिए कैसे उपयोगी है, उन्होंने कहा कि यदि चांद पर हमें हीलियम-3 मिलती है, तो इसे धरती पर लाना संभव होगा। इससे हमार ऊर्जा जरूरतों का हल निकलेगा। यह आम आदमी का सबसे बड़ा फायदा होगा। इसके अलावा वहां मिलने वाले खनिजों का लाभ भी आम आदमी ही उठाएगा। भावी अंतरिक्ष कार्यक्रमों का ब्यौरा देते हुए उन्होंने कहा कि 2010-11 में चांद पर हम उपग्रह और सतह पर चलने वाली बग्धी उतारंगे। 2015 तक हमार दो वैज्ञानिक स्पेस में पहुंचेंगे। 2020 में चांद की सतह पर हमार वैज्ञानिक उतरंगे। 2025 तक हम मंगल गृह पर दस्तक देंगे। स्पेस में हमारी स्थिति यह होगी कि हम लोगों को अंतरिक्ष की सैर कराने में सफल होंगे।

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