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बाघों के फचर्ाी आंकड़े पेश करती है सरकार!

राज्य सरकार बाघों के फर्जी आंकड़े प्रस्तुत करती है! केन्द्र सरकार द्वारा किये गये ‘बाघ सेंसस’ के बाद सूबे के पर्यावरण एवं वन विभाग के अधिकारी ही दबी जुबान से यह बात कह रहे हैं। वर्ष 2005-06 में केन्द्रीय वन मंत्रालय द्वारा करवाये गये बाघ सेंसस में सूबे में 11 से 17 बाघ पाये जाने के प्रमाण मिले हैं। रिपोर्ट उजागर होने के बाद सूबे के वन विभाग के अधिकारी हलकान हैं। दरअसल वर्ष 2005 में ही राज्य सरकार ने अपनी गणना में सूबे में 35 बाघों के दिखने की बात कही थी। तत्कालीन मुख्य वन प्राणी प्रतिपालक बीए खान ने कहा था कि ‘टाइगर प्रोजेक्ट’ घोषित वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान में 35 बाघ दिखे हैं। फिर केद्र सरकार द्वारा कराये गये सेंसस में बाघों की अधिकतम संख्या 17 तक ही क्यों पहुंची? अधिकारियों के मुताबिक इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला राज्य सरकार द्वारा कागजों पर ही सेंसस होता रहा है। दूसरा बाघों का शिकार हो गया हो। दूसर कारण का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। सरकारी स्तर पर एक भी बाघ के शिकार की बात नहीं कही गई है। ऐसी स्थिति में बाघों के कम होने का पहला कारण ही स्पष्ट है कि वन विभाग अब तक बाघों का फर्जी सेंसस करता रहा है। हालांकि वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान में काम कर चुके विभागीय अधिकारियों का कहना है राज्य सरकार की पिछली दो गणनाओं में सही ढंग से गिनती नहीं हुई थी और अनुमान के आधार पर बाघों की संख्या घोषित कर दी गई थी। केन्द्रीय वन मंत्रालय के निर्देश पर बाघों की गणना सही तरीके से हुई है। उनका यह भी कहना है कि वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान से सटे उत्तर प्रदेश के वन्य प्राणी उद्यान एवं नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान में बाघों के माईग्रेशन से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

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