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वाहु वाहु गोबिंद सिंहच

गुरु गोबिंद सिंह की लासानी शख्सियत का कमाल यह था कि वे सब के थे और सब उनके अपने। पटना के पंडित शिवदत्त को उनमें भगवान राम के दर्शन होते थे तो नवाब रहीम बख्श उन्हें अल्लाह का रूप मानता था। नौ वर्ष की बाल्यावस्था में कश्मीरी पंडितों की पुकार पर उन्होंने पिता श्री गुरु तेग बहादुर जी को धर्मरक्षा के लिए विदा किया तो पिता के रूप में धर्मयुद्ध में अपने चारों बेटों की आहुति दे दी। जब साहिबजादों की मां ने सवाल किया कि मेरे लाल कहां हैं, तो खालसा पंथ की ओर इशारा करके कहा- ‘इन पुत्रन के सीस पर वार दिए सुत चार, चार मुए तो क्या हुआ जीवित कई हजार।’ उन्होंने स्वयं को हमेशा अकाल पुरुष का दास ही कहा और यहां तक चेतावनी दे दी कि जो हमें परमेश्वर कहेगा, वह नरक का भागी होगा। लेकिन इसके साथ ही वे धर्मरक्षक, संत कवि, कुशल सेनापति, जांबाज सैनिक, अद्वितीय विद्वान, सृजनात्मक प्रतिभा के धनी रचनाकार, निराकार की भक्ित में लीन रहने वाले तपस्वी, समाज सुधारक, उच्च कोटि के कर्मयोगी, गुणों के पारखी जौहरी और मानवता की रक्षा के लिए पिता से लेकर चारों पुत्रों तक की कुर्बानी दे देने वाले अद्वितीय इतिहासपुरुष थे। गुरुदेव न कुल 18 युद्ध लड़े, लेकिन ज़र और जमीन के लिए नहीं, बल्कि दुष्टों के दमन और धर्म तथा मजलूम की रक्षा के लिए। गुरु गोबिंद सिंह के जीवन का मिशन और मकसद था- ‘धर्म चलावन संत उबारन, दुष्ट सबन को मूल उपारन’। इस मिशन के लिए दबाये, सताये लोगों के साथ तादात्म्य स्थापित किया और उन्हें अपने बराबर स्थान दिया। अपने हाथों से सजाए गए खालसा को उन्होंने अपनी सभी सफलताओं का श्रेय भी उसे दिया। यही नहीं, खालसा के आगे अपनी सत्ता शून्य कर दी और यहां तक फरमाया कि मैं जा कुछ भी हूं इसी खालसा पंथ के कारण हूं।

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