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उचााले की ओर

बेंगलुरु में यौनकर्मियों के लिए खोला गया रस्तरां उनकी बेहतरी के प्रयास की दिशा में एक सार्थक पहल है। सदियों से शोषण, भेदभाव और सामाजिक लांछन झेल रहे यौनकर्मियों की सुध एक सामुदायिक संगठन ने ली है और विश्व बैंक की सहायता से इस काम को अंजाम दिया। सरकार ट्रैफिकिंग की समस्या से निपटने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है और देह व्यापार में बच्चियों की बढ़ती मांग से चिंतित होकर अनैतिक देह व्यापार निषेध अधिनियम में संशोधन कर कानून को सख्त बनाने की बात कर रही है, लेकिन जब तक इनके लिए रोगार की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होगी तब तक इस समस्या से निजात पाना कठिन है। यह सच है कि अपनी मर्जी से कोई इस पेशे में नहीं आता। ट्रैफिकिंग के जरिए लाई गई लड़कियां यहां आने को मजबूर की जाती हैं। गरीबी के कारण कई बार स्वयं परिवार वाले लड़कियों को इस पेशे में भेज देते हैं। इनकी मजबूरियों का फायदा वे लोग उठाते हैं, जो इस पेशे को किसी भी तरह गुलजार और शोषित औरतों को खामोश रखना चाहते हैं। एक बार बाहुबलियों के जाल में फंसी लड़कियां अगर यहां से जाना चाहें तो भी नहीं जा सकतीं। और अंधेरी कोठरियों में नरक भोग रहीं इन लड़कियों को किसी तरह वहां से निकलने का मौका मिल जाए तो भी समाज उन पर फब्तियां कसने से बाज नहीं आता। एक तरफ उन पर धंधा बंद करने का दबाव बनाया जाता है और दूसरी तरफ इतना उत्पीड़न किया जाता है कि वे वापस उसी पेशे में लौटने को मजबूर हो जाती हैं। इस सबके बावजूद हकीकत यह है कि वे अपने बच्चों को इस पेशे से दूर रखना चाहती हैं। उनकी मांग है कि उनके बच्चों को आम बच्चों की तरह सामान्य जीवन जीने दिया जाए, बेहतर जगहों पर इनके रहने की व्यवस्था हो या फिर इनके बच्चों के लिए हॉस्टल बनाए जाएं ताकि वे जीवन में तरक्की करं। भारतीय पतिता उद्धार सभा के अध्यक्ष खैराती राम भोला तो बरसों से मांग कर रहे हैं कि जो महिलाएं इस पेशे से छुटकारा चाहती हैं, उन्हें शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जाए, सरकार उन्हें और उनकी शादी लायक बच्चियों के लिए आर्थिक सहायता दे। अब जब एक संगठन ने सही दिशा में एक कदम उठाया है तो यह सिलसिला यहीं नहीं रुकना चाहिए। अंधेर से निकल कर उााले की ओर बढ़ते उनके ये कदम औरों के लिए भी प्रेरणा बनेंगे, ऐसी उम्मीद है।

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