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आईआईटी से निकल रहे प्रोडक्ट साइंटिस्ट नहीं

विगत कुछ सालों से देश में साइंस एजुकेशन का परिदृश्य थोड़ा बदला है। लेकिन बदलाव सिर्फ इतना है कि अब नौजवान साइंस में कॅरियर तलाशने लगे हैं। किन्तु अभी भी प्रतिभाशाली नौजवान साइंस में नहीं पहुंच पा रहे। साइंस की पढ़ाई ऐसी नहीं कि वह स्टूडेंट की सृजनशीलता को आगे बढ़ा सके और जिज्ञासा पैदा कर सके।ड्ढr ड्ढr परिणाम यह है कि आज नामी आईआईटी समेत तमाम उच्च साइंटिफिक शिक्षण संस्थानों से प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में साइंटिफिक मैनपावर तो तैयार हो रही है। लेकिन वे सिर्फ एक साइंटिफिक प्रोडक्ट बनकर निकल रहे हैं, ऐसे साइंटिस्ट नहीं जो नए आविष्कार या बड़े अनुसंधान कर सकें। यही कारण है कि देश में साइंटिफिक वर्कफोर्स की कमी नहीं होने के बावजूद हम नए अनुसंधानों में पिछड़ रहे हैं। शिक्षाविद् और वैज्ञानिक प्रोफेसर यशपाल कहते हैं कि कहते हैं कि हमें आईआईटी एंट्रेंस टेस्ट का पैटर्न बदलना होगा।ड्ढr ड्ढr सिस्टम ऐसा बनाना होगा जिसमें टैलेंटेड नौजवान स्थान पा सकें न कि सिर्फ कोचिंग लेकर सफल होने वाले उम्मीदवार। कोचिंग से आईआईटी करने वालों में न तो क्यूरसिटी है और न ही क्रिएटिविटी। प्रो. यशपाल के अनुसार कुछ समय पूर्व लागू हुए नेशनल कैरिकुलम फ्रेमवर्क से निचले स्तर पर विज्ञान की शिक्षा का परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका है। अब इसे उच्च स्तर पर भी बदलने की जरूरत है। मैकिन्जी सव्रेक्षण के अनुसार इंडिया में तैयार होने वाले 75 फीसदी और चीन के 25 फीसदी इंजीनियर मल्टीनेशनल में काम करने के लायक नहीं। भारत में प्रतिवर्ष छह लाख इंजीनियर तैयार होते हैं।

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