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आंकड़े झुठला रहे सरकारी दावे

ेंद्र सरकार की तमाम पहल और भारी आर्थिक अनुदान के बावजूद प्राथमिक स्कूलों में दाखिला दर में कोई भी वृद्धि नहीं हुई। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार बीते पांच सालों के देश के प्राथमिक स्कूलों में दाखिला दर में एक फीसदी की भी वृद्धि नहीं हुई। बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने की समस्या पर काबू पाना सरकार के लिए मुश्किल हो गया है। कक्षा एक से पांचवी तक बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों की संख्या जहां 25.67 फीसदी दर्ज की गई वहीं कक्षा आठ तक पढ़ाई से तौबा करने वाले छात्रों की संख्या 48.80 फीसदी है। दसवीं तक पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों की संख्या लगभग 62 फीसदी है। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशन प्लानिंग एण्ड एडमिनिस्ट्रेशन की ताजा रिपोर्ट में उक्त तथ्यों का खुलासा हुआ है। डिस्ट्रिक्ट इनफामेंर्ंसन सिस्टम ऑफ ऐजुकेशन के अनुसार वर्ष 2002-03-वर्ष 2006-07 के दौरान प्राथमिक कक्षा में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में रत्ती भर भी वृद्धि नहीं हुई। उल्टे दाखिला दर में कमी के रुझान मिले हैं। इन सालों में शिक्षा विस्तार कार्यक्रमों के लिए केंद्र ने राज्यों को भारी मदद दी। बहुसंख्यक अभिभावकों ने अपने बच्चों को प्रायवेट स्कूलों में दाखिले को प्राथमिकता दी। औसत एक जिले में सरकारी स्कूलों में जहां 133 बच्चों ने दाखिला लिया वहीं प्रायवेट स्कूलों में यह संख्या 222 थी। दिल्ली, चंडीगढ़ और केरल में सार्वाधिक बच्चों ने प्राथमिक स्कूलों में दाखिला लिया। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उड़ीसा, पंजाब, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और उत्तराखंड में दाखिला लेने वालों की संख्या कम रही। 42 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं थी। देश में पंद्रह लाख मंदिरों की तुलना में सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों की संख्या लगभग ग्यारह लाख है।

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