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असत्यनारायण की कथा

सत्यम की बेईमानी के मर्तबान से निकलते सांप-बिच्छुओं ने ऐसा माहौल बना दिया है मानो कार्पोरेट कलयुग शुरू हो गया हो। सेबी और कंपनी मंत्रालय अचानक नपुंसक दिखने लगे हैं, लेखा परीक्षकों से विश्वास उठ गया है और शेयर बाजार भी निवेशकों के आखेटक राक्षसों के अभयारण्य नार आने लगे हैं। लेकिन लाखों रािस्टर्ड कंपनियों और करोड़ों शेयरधारकों वाले एक विराट कंपनीतंत्र को किसी एक हर्षद या रामलिंगा राजू की हरकत से इतना निराश होने की कतई जरूरत नहीं। आत्मधिक्कार भर बुहारू निष्कर्षो की बजाय आवश्यकता इसकी है कि हम विश्वविजयी अधिग्रहणों के कारण इधर तेजी से प्रतिष्ठित हुई भारतीय कार्पोरेट गवर्नेस पर लगे इस पहले बड़े कलंक को धोने के रास्ते खोजें और नियामक तंत्र के समक्ष कुछ भविष्योन्मुखी सवाल रखें। अव्वल तो आज की तारीख में कंपनी मंत्रालय से पूछा जाना चाहिए कि उसने अभी तक लेखापरीक्षकों को रगुलेशन से इस कदर अछूता क्यों छोड़ रखा है? क्या प्राइसवाटर हाउस जसे अंतरराष्ट्रीय साख वाले ऑडिटर और मेरिल लिंच जसे नामी इनवेस्टर बैंकर सत्यम की काजल की कोठरी से बेदाग निकल जाएंगे? क्या उन्हें कठघर में खड़ा कर पूछा जाएगा कि सत्यम के खातों को सत्यापित करते वक्त उन्होंने आंखों देखी मक्िखयां क्योंकर निगलीं? जिन स्वतंत्र निदेशकों के लिए बोर्ड में एक तिहाई सीटें आरक्षित करने के लिए कंपनी मंत्रालय हलकान होता रहा है, वे सत्यम के बोर्ड में शेयरधारकों के हित में बोलने की बजाय धृतराष्ट्र बनकर कार्पोरट गवनेर्ंस का चीरहरण कैसे बर्दाश्त करते रहे? अमेरिका में भी एनरॉन कंपनी के खातों में सत्यम जसी हेराफेरियां पकड़ी गई थीं लेकिन एनरॉन प्रमुख केनेथ ले और ऑडिटर आर्थर एंडरसन पर कानून का जसा डंडा चला, वैसा क्या राजू और प्राइसवाटरहाउस पर चल सकेगा? फिर भंडाफोड़ के बाद सत्यम से जुड़े लाखों निवेशकों और 53 हाार कर्मचारियों की हितरक्षा किस तरह होगी? क्या कोई ऐसा समाधान निकलेगा जिसमें कर्मचारियों की नौकरी और निवेशकों का मूलधन दोनों बच सकें? क्या वे किसी बेलआउट के हकदार नहीं? ऐसे सवालों के जवाब इस क्षणिक घटाटोप में भी रौशनी दे सकते हैं। वैसे भी, गलत जवाबों के साथ जीने से बेहतर है कि सही सवालों के साथ रहा जाए।ं

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  • Web Title: असत्यनारायण की कथा