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दो टूक

हड़तालें न तो प्राकृतिक आपदा हैं, न ही हादसा या आतंकी हमला, कि वे अचानक आ धमकी हैं और सरकार उनसे निपटने लिए तैयार नहीं थी। वे बाकायदा चेतावनी देकर की जाने वाली राजनीतिक विरोध की कार्रवाइयां हैं जिनकी जानकारी सरकार को महीने भर पहले तो होती ही है। इस बीच सरकार हड़ताल पर जा रहे संगठनों से बातचीत कर उन्हें राजी कर सकती है या वैकल्पिक व्यवस्था कर सकती है। लेकिन सरकारी तेल कंपनियों के अफसरों और ट्रक ऑपरटरों ने अपनी हड़ताल से देश का चक्का जाम कर दिया और सरकार कुछ नहीं कर पाई। दरअसल हड़ताली और सरकार दोनों अंतत: जनता को ही कष्ट देकर एक दूसर को ब्लैकमेल करते हैं और यही पैंतरबाजी जनता पर भारी पड़ती है।

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