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खबर की दुनिया का सत्यम

पिछले सात साल से देश की चौथी सबसे बड़ी आईटी कंपनी सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज में चल रही जालसाजी, धोखाधड़ी से पूरा देश सकते में है। देश के सबसे बड़े बिजनेस अखबार इकनॉमिक टाइम्स का कहना है कि यह कालिख पूरे उद्योग जगत का मुंह काला कर गई। बिजनेस के कार्यकलापों को बेहद नजदीकी से जानने वाले राहुल बजाज और अमित मित्रा की खतरनाक चेतावनी है कि यह चल रही वित्तीय हेराफेरी और महाघोटालों का संकेत भर है। संपत्तियों, बिक्री और मुनाफों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना कॉरपोरट जगत में घर-घर की कहानी है। जो करो और पब्लिक मनी के बूते पर अपनी जायज-नाजायज महत्वाकांक्षाओं को साकार करना चाहते हैं। न्यूज मीडिया को यह महाघोटाला आंदोलित कर रहा है कि पिछले सात साल से इतना बड़ा फर्ाीवाड़ा चलता रहा और वह उसे सूंघ भी नहीं पाया। कोई आंखों में धूल झोंकता रहा और हम सब ताली बजाते रह गए। सबसे पीड़ादायक पहलू यह है कि सत्यम के फर्ाीवाड़े का तभी पूरी तौर पर पता चल पाया, जब उसके प्रमोटर और चेयरमैन बी. रामलिंगा राजू ने एक पत्र के माध्यम से अपने गुनाहों को कबूल किया जिससे जाहिरा तौर पर उद्योग जगत और संबंधित सरकारी महकमों की जमीन पांवों से खिसक गई। ऐसा नहीं है कि निगरानी और नियामक तंत्र की यह कलई पहली बार खुली हो। ‘सेबी राज’ के उदय से ही पब्लिक के भरोसे के साथ खिलवाड़ की अंतहीन कथा है। इसके राज्य में शुरू से ही एक से बढ़ कर एक घोटाले हुए, लेकिन उनमें से किसी का बाल बांका नहीं हुआ। 1े दरम्यिान हाारों हाार कंपनियां अपना पब्लिक इश्यू लेकर आईं और तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए लेकर फरार हो गईं। इनमें कई कॉरपोरट मेग्नेंट कहलाने वाले लीग भी शामिल हैं। इनमें से कई ऐसे भगोड़े चोला बदल कर आज भी प्रतिष्ठित बने हुए हैं और बिना किसी खौफ के कॉरपोरट गवर्नेस और हाारों हाार लोगों को तकदीर बदलने की दीक्षा देने में मशगूल हैं। हर्षद मेहता, पवन सचदेवा, रीता सिंह, बी. रत्नाकर, वैस्टर्न पैंलून के गाडगिल, केतन मेहता, मॉडर्न ग्रुप, लॉयड ग्रुप, उषा इस्पात ऐसे नाम हैं, जिन्हें लाखों निवेशक आज तक भुला नहीं पाए हैं। चिटफंड और प्लांटेशन कंपनियों का दंश अभी तक निवेशक झेल रहे हैं। विडंबना यह है कि इन सब नामचीन लोगों के स्तुतिगान में सब लोग संलग्न थे, इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ कर जिन्होंने अपनी जीविका दांव पर लगा कर इन ठगों के खिलाफ लोगों को लगातार चेताया और आज लुप्त रहने के लिए अभिशप्त हैं। अब यगरि कृष्णमूर्ति जसे संवाददाताओं और बी. एस. फर्नोडो जसे निवेश विशेषज्ञों की कमी खलती है। यगरि 80 के दशक में बेंगलुरु में आनंद बाजारसमूह के संवाददाता थे। उन्होंने तब ईस्ट वेस्ट एयर लाइंस के चेयरमैन वहावुद्दीन से यह कह कर हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था कि आपका कामकाज संदिग्ध है। दागदार, हेराफेरी करने वाले दिग्गजों से लोहा लेना यगरि की आदत में शुमार था। केनरा बैंक के चेयरमैंन रत्नाकर के मामले में यगरि ही अंतत: सही साबित हुए जिनकी हर्षद मेहता कांड में इहलीला समाप्त हो गई। आज किसी भी दिग्गज अखबार या छोटे अखबार में बी. एस. फर्नोडो जसा निवेश कॉलम नहीं है। इनके लिए निवेशकों का हित सवरेपरि है। इसलिए लिहाज से वह कभी राजा और रंक में भेद नहीं करते थे। आज अगर वी. एस. फर्नोडो का या वैसा कोई कॉलम कहीं होता, तो रामलिंगा राजू की धोखाधड़ी और जालसाजी से इस देश के लोग बहुत पहले परिचित हो चुके होते, क्योंकि रामलिंगा ने एक बार नहीं, कई बार रंगेहाथ पकड़े जाने के मौके दिए, जब बहुत आसानी से उसे ‘कॉट एंड बोल्ड’ किया जा सकता था। मसलन- -1में सत्यम ने 500 करोड़ रुपए में एक कंपनी खरीदी जिसकी आमदनी एक करोड़ रुपए सालाना थी और तथाकथित शुद्ध लाभ 25 लाख रुपए। -सत्यम का लाभ दर महा तीन फीसदी थी जो उद्योग के पैमानों के अनुसार बेहद कम है। -सत्यम का प्रति कर्मी कारोबार महा 15 लाख रुपए था जो उद्योग मानकों के अनुसार न के बराबर है। -सत्यम के प्रमोटरों की कंपनी में हिस्सेदारी लगातार घट रही थी, लेकिन इसी ने ध्यान धरने की जरूरत नहीं समझी। नतीजा यह हुआ कि मेट्रो रल के प्रेरणा पुरुष श्रीधरन की आवाज भी नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह दब कर रह गई। मीडिया चूक गया। यह सवाल आज बेमानी है कि अखबार की दुनिया बदल चुकी है, उसकी परिभाषा बदल चुकी है, उसका उद्देश्य बदल चुका है, उसके लक्ष्य बदल चुके हैं, न्यूज के पैमाने बदल चुके हैं। न्यूज अब एबीसी या टीआरपी से तय होती है। इसलिए मीडिया चूक गया, इसमें चौंकाने वाली कोई बात नहीं है। लेकिन कोई समय कितना हीन क्यों न हो, उम्मीदों से वह रीता नहीं होता है। आज बिजनेस लाइन और मिंट जसे अखबार हैं, जो नई इबारत लिख रहे हैं।ंं

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