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रिक्शा चलाकर दर्द से रूबरू होता एक फ्रांसीसी

बिहार के सासाराम शहर में इन दिनों एक फ्रांसीसी नागरिक रिक्शेवालों की जिंदगी का दर्द समझने के लिए खुद रिक्शाचालक बनकर सवारियां ढो रहा है। 40 वर्षीय फ्रांसीसी नागरिक जॉन लूई का कहना है कि वे रिक्शावालों की जिंदगी को करीब से जानना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें खुद रिक्शाचालक बनने से बेहतर और कोई रास्ता नहीं दिखा। फ्रांस में तकनीकी डिजायनर के तौर पर काम करने वाले लुई रंगीन पोशाक में रिक्शा चलाते हैं। वे हर रोज लगभग तीन घंटे सवारियां ढोते हैं। लुई ने कहा कि मैं रिक्शाचालकों की जिंदगी पर शोध करना चाहता हूं और मेरा यह प्रयास इसी संबंध में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाने को लेकर है। रिक्शा चलाने के दौरान मैं रोजाना कई रिक्शाचालकों से मिलता हूं। उनके साथ घुलने-मिलने की कोशिश करता हूं। इससे मुझे उनकी दिक्कतों को समझने का मौका मिलता है। मेरे लिहाज से शहर की धूल भरी सड़कों पर सीखने का यह अनूठा जरिया है। शोध पूरा होने के बाद लुई रिक्शाचालकों की मदद करना चाहते हैं। इसके लिए उनके दिमाग में कई विचार हैं, जिनमें चंदा जमा करके रिक्शाचालकों के लिए कुछ सकारात्मक काम करना भी एक है। लुई ने बताया कि उन्होंने अनुभव हासिल करने के लिए बांग्लादेश में भी कुछ दिनों तक रिक्शा चलाया है। उन्होंने कहा कि मेरी मुहिम दो महीने पहले बांग्लादेश में शुरू हुई थी। मैं इससे पहले कोलकाता और झारखंड में भी रिक्शा चला चुका हूं। लुई ने बताया कि सासाराम के बाद उनका वाराणसी, आगरा, दिल्ली, राजस्थान और मुंबई जाने का इरादा है। उन्होंने कहा कि मैं अलग-अलग स्थानों पर रिक्शा चलाकर अपने शोध के लिहाज से जानकारी जमा करना चाहता हूं।

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