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हड़ताल के सबक

लगता है अब इस देश में शोषित किसान, मजदूर और आदिवासी नहीं संपन्न खाते-पीते सरकारी अधिकारी विद्रोह करते हैं। विपन्न वर्ग यह सोच कर विद्रोह करता था कि उनके पास खोने को कुछ भी (नौकरी भी) नहीं है, जबकि सरकारी तेल कंपनियों के पचास हाार संपन्न अफसरों ने यह सोच कर विद्रोह किया कि उनके हाथ में तेल जसी महत्वपूर्ण ऊरा का नियंत्रण है, नौकरी की सुरक्षा है और फिर गांठ भी पूरी है, इसलिए उन्हें कौन झुका सकता है। शायद उन्होंने यह भी सोच रखा था कि तीन-चार महीने बाद चुनाव का सामना करने जा रही सरकार इतने सार अफसरों और हड़ताल से परशान जनता की नाराजगी कैसे झेल सकती है। उन्हें यह संभवत: यकीन था कि इस देश का जनमत अब गरीब वर्ग नहीं संपन्न वर्ग के साथ हो चला है, इसलिए उनकी हड़ताल के साथ लोग सहयोग करंगे। लेकिन वे यह भूल गए थे कि सरकार का काम सिर्फ तेल कंपनियों को ही चलाना नहीं, उसे तेल के साथ तेल की धार भी देखनी पड़ती है। इसीलिए तेल कंपनियों के अफसरों के सार दांव उल्टे पड़े और सरकार की एक घुड़की के बाद उन्होंने हथियार डाल दिए। नौकरी जाने और गिरफ्तारी की तलवार लटकते ही वे काम पर लौट आए। आयल सेक्टर्स आफीसर्स एसोसिएशन का तर्क है कि उनका वेतन पिछले दिनों संशोधित किए जाने के बावजूद उनके मिडल लेवल के अफसरों का वेतन निजी क्षेत्र के समकक्षीय वेतन से पौने दो लाख कम है। इसलिए उन्हें अभी दी गई 40 फीसदी वृद्धि की जगह सौ प्रतिशत बढ़ोतरी मिलनी चाहिए। लेकिन वे यह बात भूल जाते हैं कि सरकारी क्षेत्र में नौकरियों की जो गुप्त बुलेटप्रूफ सुरक्षा उन्हें प्राप्त है वह उन्हें द्विा की स्थिति में पहुंचा देती है। इसलिए उर्वरक व बिजली जसे कारखानों और भारत के गतिशील महानगरों के जीवन को ठप कर इन मुट्ठी भर अफसरों ने जो हासिल करना चाहा, वह किसी हद तक सही भी हो पर,उसका तरीका किसी को उचित नहीं लगा। सरकार का दो दिनों तक लाचार दिखना भी लोगों को कतई अच्छा नहीं लगा। खासकर इस वक्त जब आतंकवाद और मंदी से घायल देश सरकार के साथ एकाुट हो कर खड़ा है। इस मौके पर यह सुझाव भी मौजूं है कि तेल के खुदरा नेटवर्क में सरकारी के साथ निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी हो। यह होती तो दो दिन भी जनता को यह मुसीबत न झेलनी पड़ती।

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