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बच्चे हमारे वक़्त के

भोर की बेला में घर के सब लोग गहरी नींद में थे, एक किशोर अपने पिता का मोटरबाईक लेकर सड॥क पर निकल गया। उम्र की नासमझी, रफ़्तार और साहसिक आनन्द सब मिलकर एक वरिष्ठ नागरिक की जान ले बैठे। पिता का कहना है कि उसे पता ही नहीं कि उसका बेटा बाइक चलाना जानता है। लम्बा केस लड़ने की उसमें सामथ्र्य नहीं। नतीजा यह कि बच्चा सजा तो पाएगा ही और उसके साथ सारा परिवार भी दु:ख भोगेगा। जिनका बुजुर्ग अकारण चला गया उनकी पीड़ा की सीमा नहीं। यह किस्सा घर-घर का है। किशोरावस्था में जोखिम उठाकर रोमांच अनुभव की प्रवृत्ति, उम्र का तकाजा है। इन बच्चों को सही दिशा दिखाना मां-बाप की जिम्मेदारी बनती है। आज के नामसझ बच्चे ही कल के राष्ट्र की आत्मा बनेंगे। इन्हीं में वर्तमान करवट ले रहा है और आने वाले समय का बीजारोपण हो रहा है। कोरे कपड़े की तरह इन्हें जिस रंग में डुबोएंगे उसी में ये रंगे जाएंगे। उनके व्यक्ितत्व में अनुशासन, नियमपालन की भावना भरना भी हमारा ही काम है। इसका यह मतलब नहीं कि बार-बार टाककर उनके आत्मविश्वास को तोड़ा जाए। रवीन्द्रनाथ टैगौर मानते हैं ‘बच्चे हमारी महत्वाकांक्षाओं का ही दूसरा रूप हैं। वे ईश्वर का संदेश लेकर आते हैं कि वह मनुष्य से निराश नहीं हुआ।’ इस सुन्दर भावना की रक्षा करनी है हमें। अपनी संतान के साथ संवाद का सेतु बनाए रखना होगा। उन्हें डरा-धमका कर नहीं, निरन्तर अच्छे-बुरे का विवेक समझा कर सही रास्ते पर डालना होगा। हर नई चीज के लिए उनकी जिज्ञासा, उत्साह और ऊर्जा की सहज प्रवृत्ति को अपनी देख-रेख में उचित दिशा देना जरूरी है। वे किससे मिलते हैं, घर के बाहर अपन को ख़तरे में तो नहीं डाल रहे समाज और कानून के नियमों को तोड़ने पर अमादा तो नहीं हो रहे- इसकी जांच करते रहना हमारा कर्तव्य है। प्यार, अनुशासन और मित्रता का ऐसा मेल करें कि वे अच्छे नागरिक बन सकें।

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