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सत्यम नहीं है विप्रो

सत्यम के घोटाले के चलते कई गड़े मुर्दे उखड़ रहे हैं और उन्हीं में एक है विप्रो और मेगासाफ्ट जसी आईटी कंपनियों पर विश्व बैंक से व्यापार करने पर लगी पाबंदी। यह पाबंदी सन् 2007 में लगाई गई थी और इसे न तो विश्व बैंक ने सार्वजनिक किया था और न ही विप्रो ने। लेकिन सत्यम के वरिष्ठ अधिकारियों ने जब अपने पर विश्व बैंक की पाबंदी होने से लगातार इनकार किया तो बैंक ने नीतिगत तौर पर इन पाबंदियों को सार्वजनिक करने का फैसला किया। बैंक के इस खुलासे का असर विप्रो जसी कंपनी की साख पर भी पड़ा और पहले दिन उसके शेयर नीचे गए। लेकिन उससे ज्यादा चिंताजनक स्थिति इस चर्चा से हुई कि जब विप्रो जसी प्रतिष्ठित कंपनी की साख एसी है तो भारत की बाकी कंपनियों की क्या हालत होगी? इससे संस्थागत विदेशी निवेशकों पर भी असर पड़ने की आशंका बनने लगी । लेकिन बैंक की तरफ से विप्रो पर लगाए गए इस छोटे से धब्बे का फायदा यह हुआ कि पूरी बात सामने आ गई और दूसर दिन ही बाजार में विप्रो के बढ़ते शेयरों ने यह संदेश दे दिया कि उसने कुछ भी गलत नहीं किया है। वास्तव में विप्रो की इस पाबंदी की सत्यम के महाघोटाले से न तो कोई तुलना की जा सकती है न ही करनी चाहिए। दोनों आकार-प्रकार और अपने असर में बिल्कुल अलग हैं। विप्रो ने विश्व बैंक के कुछ कर्मचारियों को महा चंद शेयर दिए थे जो वहां पर आम चलन था और जो अमेरिकी संस्था सिक्योरिटीा एंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी)के नियमों के मुताबिक गैरकानूनी नहीं था। यहां यह सवाल जरूर बचे रहते हैं कि क्या सन 2000 में विश्व बैंक की नीतियों के मुताबिक एसा करना उचित था या बाद में नीति में कोई बदलाव हुआ। पर कंपनी और व्यापार के अनुभवी लोगों का यह तर्क भी उचित है कि अमेरिकी और यूरोप के बाजार में भारतीय कंपनियो को सौदा पाने के लिए बेहद मेहनत करनी पड़ती है और आउटसोर्सिंग के बड़े सौदे पाने में ं सफलता सिर्फ मेहनत से नहीं मिलती। लेकिन कंपनी ने एसा कोई पाप नहीं किया है जिसके लिए उसको लांछित किया जाए, न ही अमेरिका के पूर वित्तीय बाजार के इतने बड़े पतन के गवाह बने विश्व बैंक ने एसा कोई क्रांतिकारी काम किया है, जिसकी वाहवाही की जाए। दरअसल विप्रो पर लगे इस धब्बे को मंदी के इस दौर में काजल का टीका माना जाए तो अतिशयोक्ित नहीं होगी।ं

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