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सूर्य और मकर संक्रांति

वेद में कहा गया है ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’। इस जगत की आत्मा सूर्य है, जिनके अनुसार मनुष्य ने सृष्टि के अद्भुत रहस्यों को जानने का प्रयास किया है। ऐसी मान्यता है कि सूर्य स्थिर है, पृथ्वी इसकी परिक्रमा करने में जितना समय लगाती है, उसे ही सौर वर्ष कहा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य की परिक्रमा पृथ्वी 365 दिन और 6 घंटे में करती है, परंतु चौथे वर्ष (लीप ईअर) में फरवरी को 2दिन का बनाकर इन 6 घंटों की गणना को ठीक कर दिया है, परन्तु इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों की गणना के अनुसार 365 दिन 6 घंटे मिनट 11.4 सेकेन्ड में परिक्रमा पूर्ण मानी जाती है। ग्रेगेरियन कैलेण्डर को मानने वाले विद्वानों के पास इस मिनट का कोई उत्तर नहीं है। जबकि भारतीय कालगणना में प्रतिपल, प्रतिक्षण की गण्ना की जाती है। इसीलिए पंचांग के अनुसार मुहूर्त निकाला जाता है। पंचांग में एक-एक पल के हिसाब का वर्णन होता है। भारतीय सौर वर्ष की कालगण्ना में लगभग अंग्रेजी वर्ष सौर वर्ष के बराबर ही होता है। इसीलिए भारतीय हिन्दू समाज के दो पुनीत पर्व मकर संक्रांति (14 जनवरी) और बैशाखी (13 अप्रैल) को प्रतिवर्ष आते हैं। ये पर्व सौर वर्ष पर आधारित हैं तथा शेष नहीं हैं। दीपावली, रक्षाबंधन तथा होली आदि की गणना चन्द्रवर्ष के अनुसार होती है। खगोल विज्ञान के अनुसार 12 मास प्रकृति की देन हैं। ये पृथ्वी की गति के पड़ाव हैं जो सूर्य की परिक्रमा के समय पड़ते हैं। चन्द्र वर्ष के बारह मास भी शुद्ध प्राकृतिक हैं। पृथ्वी की परिक्रम करते हुए चन्द्रमा जिस समय जिस नक्षत्र के क्षेत्र में यात्रा करता है उसी नक्षत्र के नाम पर महीने का नाम है, यथा चित्रा नक्षत्र से ‘चैत्र मास’, विशाखा नक्षत्र से वैशाख मास आदि हैं। अर्थात चन्द्रमास हो या सौर मास दोनों की कल्पना सृष्टि में हो रही घटनाओं के खगोल विज्ञान द्वारा किए गए सूक्ष्म अन्वेषणों का ही परिणाम है, यह कोई कपोल कल्पना नहीं है।

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  • Web Title: सूर्य और मकर संक्रांति