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कि पैसा रोकता है

झारखंड में सब कुछ उल्टा-पुल्टा ही हो रहा है। जिस वक्त भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जाना चाहिए था, नहीं किया गया, बाद में यही काम हुआ। फिर दल-बदल कानून के उल्लंघन के आरोपी विधायकों की भी जिस वक्त सदस्यता जानी चाहिए थी, नहीं गयी। अब जरूर जायेगी। ऐसे दर्जनों दृष्टांत हैं।ड्ढr इसी तरह जारी राजनीतिक अस्थिरता को दूर करने के लिए राष्ट्रपति शासन जरूरी है, पर ऐसा यहां का कोई विधायक नहीं चाहता। इसका सबसे मुख्य कारण है विधायकों को विधायक कोष से प्रति वर्ष होनेवाली 50 से 60 लाख रुपये की अवैध आय। इसे यहां की जनता भी जानती है, सरकारी नौकर भी। सरकार में बैठे दूसर लोग भी। झारखंड के विधायकों को सरकार ने विकास कार्यो के लिए प्रति वर्ष तीन करोड़ की राशि का प्रावधान किया है। यह राशि विधायक की अनुशंसा पर ही खर्च होगी।ड्ढr जब विधायकों को अपने कोष पर इतना एकाधिकार होगा, तो भ्रष्टाचार का आकार भी उसी अनुरूप होगा। अनौपचारिक बातचीत में विधायक बताते हैं कि शुरुआती दौर में कुछ विधायक तो कमीशन लेते ही नहीं थे, कुछ जो मिल गया उसी से संतुष्ट हो जाते थे। पर कुछ तो शुरू से ही 10 प्रतिशत कमीशन, काम आवंटन से पूर्व ही ले लेते थे।ड्ढr अब यह रोग लगभगीसदी विधायकों को लग चुका है। अंतर भर इतना है कि कुछ अब बगैर 20 फीसदी लिये अपना कोष नहीं खोलते और कुछ अभी भी 10-15 प्रतिशत पर भी मान जाते हैं।ड्ढr इस तरह उन्हें प्रति वर्ष अपने कोष पर लगभग 50-60 लाख रुपये का अवैध सूद बगैर किसी मेहनत का मिलते जा रहा है। वर्तमान वित्तीय वर्ष की समाप्ति के साथ ही अप्रैल में फिर यह कमाई होनेवाली है। परिणामस्वरूप कोई भी समय पूर्व चुनाव या राष्ट्रपति शासन नहीं चाहता। ें

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