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घोटाला : सब जग जानी, पंडित अज्ञानी

बचपन में एक कहानी सुनी थी। सत्यम का घोटाला सामने आया तो वह याद आ गई। एक समय की बात है कि एक गांव में एक धोबी रहता था। उस सीधे-सादे और अनपढ़ धोबी का एक गधा था, जो घाट से घर तक कपड़ों को ढोता था। एक दिन वह दौड़ा दौड़ा किसानों के पास गया और उनसे कहा कि वे फसल काट लें क्योंकि बारिश हो सकती है। किसानों को चिंता हुई और वे पंडित के पास भागे कि कहीं सचमुच ही बारिश का कोई योग तो नहीं है। पंडितों ने पोथी पत्रा निकाला। गणना की और कहा कि बारिश नहीं हो सकती। लेकिन बारिश हो गई और किसानों की फसल बर्बाद हो गई। तब वे पछताए कि अगर धोबी की बात मान ली होती तो शायद यह न होता। किसानों ने सोचा कि यह धोबी तो पंडितों से भी ज्यादा विद्वान है। लेकिन धोबी ने कहा कि न तो उसे कोई विद्या आती इसे कोई खुदाई इलहाम होता है। उसने बताया कि बारिश से पहले उसके गधे के बाल खड़े हो जाते हैं। इस बार बाल खड़े हो गए तो उसने किसानों को बता दिया कि बारिश होने वाली है। यह कहानी हमें सीख देती है कि धोबी की बात पंडित के पोथे से ज्यादा काम की हो सकती है। सत्यम की कहानी भी कुछ ऐसे ही चल रही है। इस हाई प्रोफाइल कंपनी का खोखलापन एक ऐसा रहस्य था, जिसे पिछले पांच साल से आईटी उद्योग में तकरीबन हर कोई जानता था। आईटी के पेशवर लोग रामलिंगा राजू की कंपनी को आखिरी विकल्प मानते थे। अगर कोई नौजवान सत्यम में पहुंच ही जाता था तो लोग उसे सलाह देते थे कि बरखुरदार जल्दी से जल्दी किसी दूसरी कंपनी में नौकरी तलाश लो। मुझे खुद एक ऐसा मामला मालूम है जहां लड़की वालों ने एक लड़के से शादी से सिर्फ इसलिए इनकार कर दिया कि वह सत्यम में नौकरी करता था। यानी तकरीबन हर किसी को पता था कि सत्यम का बुलबुला एक न एक दिन फूट ही जाएगा। लेकिन हैरत है कि एक भी एजेंसी को कोई भनक नहीं लगी। किसी ने भी वहां वित्तीय नियम कायदे को लागू करने की कोशिश नहीं की। या फिर उन्होंने ही बही-खातों में हेर-फेर होने दी और अपना मतलब साधते रहे। इसलिए अब यह देखकर हैरत हो रही है कि कंपनी और वित्तीय जगत के पंडित किस तरह सत्यम के उत्थान और पतन का विश्लेषण कर रहे हैं। इस जगह यह बताने की जरूरत नहीं है कि यह सारा प्रकरण क्यों मुमकिन हुआ, लेकिन फिर भी इस मामले में दो चीजें काफी दिलचस्प हैं। एक तो यह कि जब रामलिंगा राजू के करतूतों का कच्चा चिट्ठा सामने आया तो पहले पांच दिन तक राजनीतिक हलकों के लोगों ने चुप्पी ही साध ली। खासतौर पर हैदराबाद में जहां सत्यम का मुख्यालय है। राजनैतिक दलों की यह आदत होती है कि किसी भी घटना के बाद वे एक दूसर पर आरोप लगाने लग जाते हैं। लेकिन तेलुगू देशम और कांग्रेस ने एक दूसर पर सत्यम को प्रश्रय देने के आरोप नहीं लगाए। इसकी एक वजह यह है कि सत्यम की कामयाबी में इन दोनों की ही भूमिका है और दूसरी महत्वपूर्ण बात थी आम आदमी की प्रतिक्रिया। जिन लोगों ने सत्यम में भारी निवेश किया है उन्हें आम आदमी नहीं कहा जा सकता। और इन निवेशकों को छोड़ दें तो आम आदमी को न तो कोई हैरत हुई और न कोई सदमा लगा। लेकिन वित्तीय गड़बड़ियों को देखकर लोगों में गुस्सा है और वे मानते हैं कि ये लोग किसी न किसी तरह से सजा से बच निकलेंगे। विभिन्न सरकारं आौर विभाग इसके लिए जो कर रहे हैं उसे लेकर भी धारणा यही है कि यह सब तो घोटाले को ढंकने छुपाने की ही प्रक्रिया है, दोषी को सजा देने की नहीं। यह नजरिया किसी भी लोकतंत्र के लिए काफी खतरनाक है, यह बताता है कि लोगों का व्यवस्था से विश्वास उठ गया है। लोंगों ने जिस तरह असहाय होकर राजनीतिकों और नौकरशाहों के गठाोड़ को और उसकी वजह से कंपनी क्षेत्र को घोटालों की खुली छूट को स्वीकार कर लिया है वह भी अच्छी खबर नहीं है। इससे भी बुरी बात यह है कि इस घोटले का भंडाफोड़ किसी सरकारी विभाग की सक्रियता की वजह से नहीं हुआ, इसलिए हुआ कि राजू ने इसे करना सही समझा। उसी ने इसका समय चुना और तरीका भी। इससे लोग यही नतीजा निकाल सकते हैं कि राजू ने कुछ लोगों की खाल बचाने के लिए खुद को शहीद कर दिया। लेकिन दिक्कत यह है कि इससे पूर कंपनी जगत की छवि खराब हुई। इसे ठीक करने के लिए खासी मेहनत की जरूरत होगी। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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