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संत दयाराम भाई

संत दयाराम भाई परम भागवत् संत थे। उनकी भक्ित रचनाएं गुजरी साहित्य की अक्षय-निधि हैं। उनका परिवार परम वैष्णव भक्त था। उनके यहां संत-समागम होता था। इस कारण दयाराम भाई के हृदय में श्रीकृष्ण की भक्ित के भाव बाल्यकाल में ही प्रस्फुटित हो उठे थे। वह बाल्यावस्था में ही, चांणोद गांव में, नर्मदा के तट पर बैठकर उसके सौंदर्य को देखा करते। उसी बचपन में उनकी काव्य-प्रतिभा प्रस्फुटित हुई- ‘अति शुभ गुर्जर मधि दछिन प्रयास रुचिर, महासरित श्री नम्रदा अति शुचि उत्तर तीर।’ वहां नर्मदा के तट पर स्थित शेषषायी भगवान के मंदिर में माता के साथ जाया करते थे। उनकी भगत् भक्ित जसे-ौसे बढ़ती गयी, उनमें काव्य-प्रतिभा का विकास भी होता गया। उन्होंने शेषशायी भगवान को एक पद लिखकर सुनाया, जिसमें उनका स्तवन किया गया था:- ‘प्रथम प्रणमुं श्री गुरु ना पाय र शेषशायी छोगाला। श्रीमद् वल्लभ विट्ठल व्रजराय र शेषशायी छोगाला।’ दयाराम भाई की भक्ित जसे-ौसे बढ़ती गयी, श्रीकृष्ण की लीलाओं में उन्हें उतना ही अधिक रस आने लगा। दस वर्ष के थे तो पिता ने विवाह कर दिया। फिर अचानक पिता का निधन हो गया। गृहस्थी का भार दयाराम भाई पर आ गया। पर वह तो भगवान कृष्ण के चिंतन, भजन और स्मरण में ही सारा समय बिताते थे। धीर-धीर उम्र बढ़ने के साथ वैराग्य के भाव भी बढ़ते गए। फिर भगवत् भक्त इच्छाराम भट्ट से भेंट हो गई। उनके सत्संग के फलस्वरूप दयाराम भाई का जीवन कृष्णमय हो गया। इच्छाराम भट्ट की शिक्षा के अनुसार दयाराम भाई ने भागवत् धर्म और जीवन पद्धति अपनाई। नाथद्वारा में श्रीनाथ जी के दर्शनों के लिए पहुंचे तो उनका मन ऐसा रमा कि वह वहीं रहने लगे। अपनी काव्य-धारा से दयाराम भाई ने वहां भक्ित की ऐसी रसधार बहाई कि श्रीनाथ जी ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए। दयाराम भाई की भक्ित पुष्टिमार्गीय थी। पुष्टिमार्ग के अनुसार जगत सत्य है। जगत, जीव, अन्तर्यामी अक्षर आदि का निमित्त और उपादान शुद्ध निगरुण ब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण ही एक हैं। इसी सिद्धांत को अपनाकर दयाराम भाई ने अपनी रचनाओं द्वारा श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ित की।

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  • Web Title: संत दयाराम भाई