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दो टूक

झारखंड में अंतत: राष्ट्रपति शासन लग गया और विधानसभा निलंबित हो गयी। लोकतांत्रिक शासन में ऐसे अवसर टालने की तमाम कोशिशें होती हैं, क्योंकि निर्वाचित प्रतिनिधियों की विधानसभा ही जनता के अधिकार सुरक्षित रखने में समर्थ है। पर स्वार्थ और नेताओं की आपसी कलह के बावजूद प्रयोगशाला बने झारखंड में भारतीय संविधान ने चुनी हुई सत्ता का एक मौका फिर से दिया है। पर, इससे तो अच्छा था कि विधानसभा भंग कर दी जाती। कम से कम जनता को मूर्ख बनाने का सिलसिला तो थम जाता। बदली परिस्थितियों में चुनाव के साथ ही लोकतांत्रिक सरकार के गठन का रास्ता साफ होगा, पर ये नेता कौन सा मुंह लेकर जनता के बीच जायेंगे? प्रयोगों से थक चुकी जागरूक जनता शायद कोई ऐसा जनादेश दे, जिसकी कल्पना भी ये नेता नहीं कर पायेंगे।

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