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जनता हारी, राजनेता जीते !

आखिर झारखंड की राजनीति ने वह कीर्तिमान भी बना डाला, जिसकी कमी रह गई थी। जनता ने अपने जिन नुमाइंदों को चुनकर सुशासन के लिए विधानसभा भेजा था, आपसी सिर-फुटव्वल में वे ऐसे उलझे कि लोकतंत्र तार-तार हो गया। जिस विधानसभा का कार्यकाल अभी महीनों बचा हो, वहां राष्ट्रपति शासन लगाना पड़े, इससे शर्मनाक और क्या हो सकता है? क्या हमार राजनेताओं का स्तर इतना गिर गया है कि वे अपने और पार्टीहित से ऊपर उठकर राज्यहित में नहीं सोच सकते? राज्य के मौजूदा हालात तो इसी बात को पुख्ता कर रहे हैं। अगला मुख्यमंत्री कौन हो, इसके लिए यूपीए, एनडीए और निर्दलीय विधायक- सभी अपने-अपने समीकरण फिट करने में लगे रहे। और यूपीए में शामिल दलों- कांग्रेस, झामुमो और राजद ने सिर तरह अपनी डफली-अपना राग वाली मुद्रा अख्तियार की, उसने हालात और बिगाड़ दिए।ड्ढr इस पूर घटनाक्रम में कार्यवाहक मुख्यमंत्री शिबू सोरन की भूमिका चिंतनीय भी रही और दयनीय भी। महाभारत में जिस तरह भीष्म पितामह तीरों की शैया पर लेटकर युद्ध के मूकदर्शक बने रहे, उसी तरह शिबू भी रांची के अस्पताल में लेटकर सत्ता के सिंहासन का महायुद्ध देखते रहे। भावी मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने चंपई सोरन का नाम आगे तो कर दिया लेकिन इस पर सहमति बनाने के लिए दिल्ली जाने की जहमत उन्होंने नहीं उठाई। न ही मजबूती से कोई ऐसा नाम सामने ला सके, जिस पर कांग्रेस-राजद और पूरा यूपीए कुनबा एकमत हो पाता।ड्ढr अब आते हैं उस प्वाइंट पर, जहां से राज्य में राष्ट्रपति शासन के हालात बनने शुरू हुए यानी तमाड़ उपचुनाव। इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिबू यानी गुरूाी राज्य के धाकड़ नेता हैं, लेकिन पिछले दिनों तेजी से घटे घटनाक्रम ने उनकी साख पर बट्टा ही लगाया है। मुख्यमंत्री रहते हुए शिबू जसे नेता का उपचुनाव हारना किसी विस्मय से कम नहीं। वर्ष 1े लोकसभा चुनाव में मौजूदा यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने कर्नाटक के बेल्लारी और यूपी के अमेठी से चुनाव लड़ा और दोनों जगह से जीतीं। एक सीट दक्षिण भारत में थी और एक उत्तर भारत में, पर दोनों जगह सोनिया को जनता का समर्थन मिला। इस नजर से देखें तो शिबू की हार के काफी गहर संकेत हैं। अब कोई यह तर्क देता रहे कि गुरूाी वहां से लड़ने के इच्छुक नहीं थे या साजिश के शिकार हुए वगैरह-वगैरह।ड्ढr यह वक्त जनता के लिए भी सोचने का है कि क्या वह दुबारा ऐसे लोगों को चुनकर विधानसभा भेजना चाहेगी जिनके लिए राजनीति विशुद्ध रूप से एक पेशा बनकर रह गया है। जनता की सेवा और राज्य-देश हित जसे शब्द उनकी डिक्शनरी में नहीं हैं। इस संदर्भ में करीब दो हाार साल पहले महान कूटनीतिज्ञ चाणक्य की कही गई यह बात आज भी कितनी प्रासंगिक लगती है कि- जिस राज्य में शासक आम आदमी की तरह रहता है, वहां जनता, राजा की तरह रहती है और जिस राज्य में शासक, राजा की तरह रहता है वहां जनता भिखारियों की तरह रहती है। ड्ढr

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