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पुरानी केंचुल में यूरोप

पुर्तगाल के राजा मैनुएल प्रथम ने जब वास्को-डि-गामा को अपने साहसिक अभियान पर निकलने के लिए धन दिया होगा तो उनके मन में क्या वैसे ही भाव रहे होंगे जैसे कि जेड.एच. कासिम को अंटार्कटिका के अभियान पर भेजते समय इंदिरा गांधी के दिल में थे? इंदिरा ने तो तब कहा था कि यह एक ऐसी वैज्ञानिक खोज होगी जो आनेवाली शताब्दियों में इंसानियत का भला करेगी पर वास्को-डि-गामा के नाविक जब समुद्र का सीना चीर रहे थे, तो उसके पीछे यूरोप की मचलती हुई औपनिवेशिक भावनाएं थीं। अपनी कैंसरग्रस्त श्रेष्ठता ग्रंथि को सहलाते हुए इस महाद्वीप के तमाम देश तब इस गुंताड़े में थे कि कैसे उन लोगों को अपने अधीन लाया जाए जो अपनी संस्कृति और सभ्यता की छांव में चैन से रह रहे हैं।
आप याद कर सकते हैं। 15वीं शताब्दी के पुनर्जागरण के बाद से यूरोप के तमाम देश इतने महत्वाकांक्षी हो गए थे कि उन्हें लगता था कि सारी दुनिया के बुनियादी खजानों पर सिर्फ उनका हक है। हमलावरों की इस भीड़ में अंग्रेज, डच, पुर्तगाली, फ्रेंच, स्पेनिश, कौन शामिल नहीं था? आज हम जिस भारत में रहते हैं वह खुद कभी इंग्लिश, फ्रेंच और पुर्तगाली कालोनियों में बंटा हुआ था। कल्पना कीजिए। अगर 1746 में क्लाइव ने डूप्ले को न हराया होता और फ्रांसीसियों ने मैदान छोड़ने का निर्णय न किया होता तो भारत कैसा होता? देश के दक्षिणी भाग पर फ्रांसीसी हुकूमत होती और उत्तर पर अंग्रेज काबिज होते। एक हिस्से की हुकूमत लंदन की तर्ज पर चल रही होती तो दूसरे की पेरिस की। फैशन अलग होते। जीवन-शैलियों पर उनका असर पड़ता। भाषाई आग्रह बदल जाते। शासन और न्याय-प्रणालियां बिल्कुल जुदा होतीं। आज भी पांडिचेरी में फ्रांसीसियों का और कुल साढ़े तीन घंटे दूर स्थित चेन्नई में अंग्रेजों का असर साफ दिखाई पड़ता है। गोवा चले जाइए तो मकानों के स्थापत्य से लेकर लोगों के रहन-सहन पर पुर्तगाली प्रभाव अभी तक कायम है। वह तो खैर थी कि जमीन के इन छोटे टुकड़ों को छोड़ दें तो अंग्रेजों से लड़कर हमने जो आजादी छीनी, उससे जवाहरलाल नेहरू तथा उनके साथियों को पूरे देश में लगभग एक-सी व्यवस्था विरासत में मिली।
आज दशकों बाद जब हम यूरोप पर नजर डालते हैं तो वह अपनी पुरानी केंचुल में फिर से समाता हुआ दीखता है। अजीब हाल है। जब दुनिया एक बेहतरीन गांव में तब्दील होने को बेकरार है, तब यूरोप अपने भयंकर दुराग्रहों की ओर लौट रहा है। हाल के दिनों में दो ऐसी घटनाएं घटी हैं जिन्होंने मुझे सोचने पर बाध्य कर दिया है। पहली घटना को रचा जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल के मुंह से निकली हुई आग ने। वैसे भी मर्केल अपने कट्टर रवैये के लिए मशहूर हैं। वे और उनके अलंबरदार दम्भ भरते हैं कि उन्होंने जर्मनी को रसातल में समाने से बचा लिया। पर अपने लहजे और कामकाज में मुझे वे बाल ठाकरे की बहन या हिटलर की पोती जैसी लगती हैं। यकीन न हो तो उनके इस बयान पर गौर फरमाइए। कंजरवेटिव क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन के नौजवान सदस्यों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विभिन्न संस्कृतियों का मिला-जुला समाज बनाने के हमारे प्रयास पूरी तरह फेल हो चुके हैं। बाहर से आए जो लोग इस देश में रहते हैं, उन्हें ईसाइयत के तौर-तरीके और यहां की भाषा स्वीकार करनी चाहिए। जाहिर तौर पर उनका इशारा तुर्की मूल के उन लोगों की ओर था जो कभी कामकाज के सिलसिले में यहां लाए गए थे। धर्म के लिहाज से देखें तो वे सारे के सारे मुसलमान हैं। मर्केल के बयान ने मुझे दो दशक पहले का एक वाकया याद दिला दिया। वे नवंबर, 1991 के दिन थे। मैं बॉन में घूम रहा था। वहां मैंने ऐसी बहुत-सी महिलाएं देखीं जिन्होंने चेहरे को नकाब से ढक रखा था। वे अन्य महिलाओं की तरह मिनी स्कर्ट भी नहीं पहने हुए थीं। उनकी टांगें लंबी जुराबों से ढकी होती थीं और चेहरे के नाम पर सिर्फ माथा, आंखें, नाक का अगला हिस्सा और होंठ दीखते थे। उनके नकाब हमारे यहां की महिलाओं की तरह पूरे शरीर को ढकनेवाले नहीं थे। मैंने पूछा कि ये महिलाएं कौन हैं? उत्तर मिला- ये तुर्की कामगारों की औरतें हैं। बरसों पहले काम के सिलसिले में वे यहां आए थे। अब यहीं जम गए हैं। जवाब में उपेक्षा साफ झलकती थी। मुझे लगा कि जर्मनी का नस्लभेदी रवैया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, हिटलर भले ही बरसों पहले मर चुका हो। अफसोस इस बात का है कि लगभग दो दशक बाद मर्केल के शब्दों से अलगाव का विष बहुत ज्यादा गाढ़ा होकर रिस रहा है। इससे भी दुखद यह है कि वे अकेली नहीं हैं।
पड़ोसी देश फ्रांस में राष्ट्रपति सरकोजी लगभग इसी तरह का रवैया दिखाते रहते हैं। वहां सिख पगड़ी, तो मुस्लिम महिलाएं बुरके को लेकर बेजार हैं। धर्म के नाम पर फ्रांस काफी बंटा हुआ दिखता है। शायद वे सन 732 के उन दिनों को नहीं भूले हैं जब फ्रैंक कबीले के सरदार ने अपनी तलवार के दम पर अरब आक्रांताओं को रोका था। कुछ अतिवादी बड़े गर्व से कहते हैं कि अगर फ्रांस नहीं होता तो यूरोप से ईसाइयत खत्म हो जाती। यह सिर्फ फ्रांस या जर्मनी का मामला नहीं है। कुछ महीनों पहले स्विट्जरलैंड की राजधानी में एक मस्जिद के निर्माण को लेकर जो हंगामा बरपा हुआ था, उसे वहां के सहज और शांत जीवन के चरित्र से नितांत उल्टा पाया गया था।
मुझे अब तक लगता था कि यूरोप के अन्य देशों के मुकाबले इंग्लैंड थोड़ा अलग है। महान शहर लंदन को कभी रोमनों ने बसाया था पर यहां के लोगों ने कभी रोम साम्राज्य को इज्जत से नहीं देखा। उपनिवेशवाद की दौड़ में भी अंग्रेज हमेशा अन्य यूरोपीय देशों के मुकाबले उल्टे चलते थे और पिछले हफ्ते जिस तरह दक्षिण एशियाई मूल के तीन सांसदों को रुसवा किया गया, वह चौंकाने वाला है। हिन्दुस्तानी मूल के लॉर्ड स्वराज पाल, लॉर्ड अमीर भाटिया और बांग्लादेशी मूल की बैरोनेस पौलाउद्दीन को कुछ महीनों के लिए निलंबित कर दिया गया। इन पर आरोप था कि इन्होंने लंदन में निवास होने के बावजूद उन भत्तों को ग्रहण किया, जिन पर उनका हक नहीं था। हालांकि, इन लोगों ने उक्त राशि को क्षमा-याचना सहित लौटा दिया था फिर भी वे माफी के योग्य नहीं पाए गए। इसके विपरीत वे नौ सांसद जो श्वेत मूल के थे, उनके माफीनामे स्वीकार कर लिए गए। खुद हाउस ऑफ लॉर्ड के सदस्य इस भेदभाव से उद्वेलित हैं और पूरी दुनिया में बहस पुरगर्म है कि इंग्लैंड में रंगभेद के दुराग्रह गहरे होते जा रहे हैं। तय है। अगर यही चलता रहा तो यह उस महाद्वीप के पतन की शुरुआत होगी, जिसने कभी दुनिया के बड़े हिस्से पर हुकूमत की थी।

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